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देश में अघोषित आपातकाल जैसे हालात : धीरज दुबे

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देश में अघोषित आपातकाल जैसे हालात : धीरज दुबे


संजय कुमार यादव check_circle
संवाददाता



गढ़वा : लगातार हो रहे इस्तीफ़े लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक: धीरज दुबे

 झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के मीडिया पैनलिस्ट सह केंद्रीय सदस्य धीरज दुबे ने देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि केंद्र की मोदी सरकार में लोकतंत्र की आत्मा को कुचला जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुखों और उच्च अधिकारियों द्वारा लगातार दिए जा रहे इस्तीफे इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि देश एक अघोषित आपातकाल की ओर बढ़ रहा है।

धीरज दुबे ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती स्वतंत्र संस्थानों की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर निर्भर करती है।

लेकिन बीते कुछ वर्षों में जिस तरह चुनाव आयोग, विश्वविद्यालय, सूचना आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थानों से जुड़े शीर्ष पदों से अधिकारी अचानक इस्तीफा दे रहे हैं, वह बेहद चिंताजनक और खतरनाक संकेत है। यह दर्शाता है कि सरकारी दबाव और नीतिगत दखल के चलते स्वतंत्र रूप से कार्य करना असंभव हो गया है।

उन्होंने कहा कि आज देश में डर और दबाव का ऐसा माहौल बना दिया गया है जहाँ संस्थान अपनी गरिमा और स्वायत्तता खोते जा रहे हैं। अधिकारी या तो सरकार के आगे झुकने को मजबूर हैं या फिर इस्तीफा देकर पीछे हट रहे हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।

धीरज दुबे ने कुछ प्रमुख उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि 2016 में नोटबंदी से पहले आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन, 2018 में उर्जित पटेल, 2017 में नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया, 2018 में मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम, 2019 में एनएससी के स्वतंत्र सदस्य पीसी मोहन और जेवी मीनाक्षी, 2021 में पीएमओ के प्रमुख सलाहकार प्रदीप कुमार सिन्हा और अब 2025 में उपराष्ट्रपति का अचानक इस्तीफा — ये सभी घटनाएं इस बात की पुष्टि करती हैं कि लोकतंत्र की नींव हिलाई जा रही है।

उन्होंने कहा कि एक स्वस्थ लोकतंत्र में असहमति का सम्मान किया जाता है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में जो भी सत्ता के खिलाफ बोलता है, उसे या तो चुप करा दिया जाता है या बदनाम कर किनारे कर दिया जाता है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की गिरती साख, केंद्र में सत्ता का केंद्रीकरण और संवैधानिक मर्यादाओं की अनदेखी — यह सब देश के लिए बेहद घातक है।

धीरज दुबे ने अंत में विपक्षी दलों से अपील की कि वे व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर देशहित और लोकतंत्र की पुनर्बहाली के लिए एकजुट हों। उन्होंने कहा कि भारत का भविष्य स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष संस्थानों पर निर्भर करता है, न कि किसी एक व्यक्ति या सरकार की मर्जी पर। जनता को भी सतर्क रहते हुए संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए खड़ा होना होगा।





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