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गढ़वा में अखिल भारतीय साहित्य परिषद जिला इकाई का गठन, कवि सम्मेलन में गूंजे राष्ट्रभक्ति और सामाजिक सरोकार के स्वर

location_on गढ़वा access_time 15-Apr-26, 03:50 PM visibility 158
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गढ़वा में अखिल भारतीय साहित्य परिषद जिला इकाई का गठन, 
कवि सम्मेलन में गूंजे राष्ट्रभक्ति और सामाजिक सरोकार के स्वर


संजय कुमार यादव check_circle
संवाददाता



गढ़वा : 14 अप्रैल 2026 की संध्या शहर के नवादा मोड़ स्थित बंधन मैरेज हॉल साहित्यिक ऊर्जा और सांस्कृतिक गरिमा से सराबोर नजर आया, जब अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की गढ़वा जिला इकाई का विधिवत गठन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ माँ शारदे के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिससे वातावरण पूरी तरह से आध्यात्मिक और साहित्यिक रंग में रंग गया।

इस गरिमामय अवसर पर परिषद के झारखंड प्रदेश उपाध्यक्ष सत्यनारायण तिवारी, प्रदेश मंत्री चंद्रकांत सिंह, पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. संजीव मिश्र ‘राजन’, पलामूं जिला इकाई के अध्यक्ष उमेश पाठक ‘रेणु’ तथा सचिव विजय शंकर मिश्र सहित कई विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ा दिया।

कार्यक्रम के दौरान अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की नवगठित गढ़वा जिला इकाई की घोषणा की गई, जिसमें विवेकानंद उपाध्याय को अध्यक्ष तथा प्रमोद कुमार को सचिव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके अतिरिक्त धर्मेंद्र कुमार ‘पुष्कर’, जयपूर्णा विश्वकर्मा एवं सोनू पांडे को उपाध्यक्ष, अमरेंद्र तिवारी को संयुक्त सचिव, नीरज मलिक को सह सचिव, गोपाल राम को कोषाध्यक्ष तथा राजीव रंजन तिवारी, परशु राम, सौरभ कुमार तिवारी, संध्या सुमन और सुशील कुमार मिश्र को कार्यकारिणी सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया।

कार्यक्रम का आयोजन दो सत्रों में किया गया। प्रथम सत्र परिचयात्मक रहा, जिसका संचालन प्रमोद कुमार ने प्रभावशाली ढंग से किया।

इस सत्र में नवगठित पदाधिकारियों एवं उपस्थित अतिथियों का स्वागत पुष्पमाला एवं अंगवस्त्र देकर किया गया। अध्यक्ष विवेकानंद उपाध्याय ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। इस दौरान परिषद की आगामी वार्षिक कार्ययोजना का भी प्रस्तुतीकरण किया गया, जिसमें साहित्यिक गतिविधियों को ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों तक विस्तार देने की रूपरेखा प्रस्तुत की गई।

अपने संबोधन में प्रदेश उपाध्यक्ष सत्यनारायण तिवारी ने कहा कि परिषद का मूल उद्देश्य राष्ट्र भावना को सशक्त बनाते हुए भारतीय संस्कृति और साहित्य की परंपरा को आगे बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और इसके माध्यम से नई पीढ़ी को सही दिशा देने का कार्य किया जा सकता है।

प्रदेश मंत्री चंद्रकांत सिंह ने गढ़वा इकाई के गठन को साहित्यिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. संजीव मिश्र ‘राजन’ ने परिषद की कार्यशैली और उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह संगठन भारतीय संस्कृति और मूल्यों के संरक्षण के लिए समर्पित है। वहीं विजय शंकर मिश्र ने कहा कि परिषद निरंतर राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक चेतना को सशक्त करने का कार्य कर रही है, जिससे समाज में सकारात्मक बदलाव संभव हो रहा है।

कार्यक्रम का द्वितीय सत्र कवि सम्मेलन के रूप में आयोजित किया गया, जिसने पूरे माहौल को काव्यमय बना दिया। स्थानीय कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रभक्ति, सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

सौरभ तिवारी ने “हम सपूत हैं भारत माँ के” कविता के माध्यम से देशभक्ति की भावना को जागृत किया, जिससे श्रोताओं में जोश और उत्साह का संचार हुआ।

धर्मेंद्र कुमार ‘पुष्कर’ ने पारिवारिक मूल्यों और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर आधारित गीत प्रस्तुत कर भावनात्मक जुड़ाव स्थापित किया।

नीरज मलिक ने अपनी ओजपूर्ण कविता “चिंगारी रख” के जरिए युवाओं में ऊर्जा और प्रेरणा का संचार किया।

जयपूर्णा विश्वकर्मा ने “ऋतु बिखर रहा है मनभावन...” गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।

अवकाश प्राप्त शिक्षक योगेंद्र सिंह ने भोजपुरी चैता “राम जी के भईले जनमवा हो रामा चैत महीनवा” गाकर लोक संस्कृति की मिठास बिखेरी, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा।

सुश्रुत सेवा संस्थान के निदेशक डॉ. टी. पीयूष ने “कर्म की याद” और “प्रथम अनुभव प्रेम का” जैसी कविताओं के माध्यम से जीवन के गहरे अनुभवों को शब्दों में पिरोया।

नवोदित कवयित्री संध्या सुमन ने अपनी पहली रचना “प्रेम का अर्थ क्या है…” प्रस्तुत कर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया और खूब प्रशंसा बटोरी।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे संस्कार भारती झारखंड प्रांत के कला धरोहर संयोजक नीरज श्रीधर ‘स्वर्गीय’ ने अपनी व्यंग्यात्मक कविता “32 वर्षों के बाद पंचायती राज आया है” के माध्यम से व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष किया, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा।

उमेश पाठक ‘रेणु’ ने “खोजते सब जा रहे हैं राम और रहमान को” ग़ज़ल के माध्यम से सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश दिया।

चंद्रकांत सिंह ने “मेरे बलमा गए रे दूर देश…” गीत के जरिए विरह की पीड़ा को सजीव रूप में प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, स्थानीय बुद्धिजीवी एवं युवा उपस्थित रहे। पूरे आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि गढ़वा की धरती पर साहित्य और संस्कृति की धारा निरंतर प्रवाहित हो रही है, जो आने वाले समय में और भी व्यापक रूप धारण करेगी।

कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ समापन किया गया।





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