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जिस दिन दूसरों के आगे हाथ फैलानेकी नौबत आवे, उस दिन मरण हो जाय तो अच्छा:- जीयर स्वामी

location_on बंशीधर नगर access_time 15-Sep-23, 06:41 PM visibility 675
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जिस दिन दूसरों के आगे हाथ फैलानेकी नौबत आवे, उस दिन मरण हो जाय तो अच्छा:- जीयर स्वामी


दिनेश पांडेय check_circle
संवाददाता



बंशीधर नगर : हाथ के ऊपर हाथ करो, पर हाथ के नीचे हाथ न करो । जिस दिन दूसरों के आगे हाथ फैलानेकी नौबत आवे, उस दिन मरण हो जाय तो अच्छा:- जीयर स्वामी। माँगना और मरना दोनों समान हैं, बल्कि माँगनेसे मरना भला। याचना करनेसे त्रिलोकीनाथ भगवान्‌को भी छोटा होना पड़ा, तब दूसरोंके लिये कहना ही क्या ? हाथ के ऊपर हाथ करो, पर हाथ के नीचे हाथ न करो । जिस दिन दूसरोंके आगे हाथ फैलानेकी नौबत आवे, उस दिन मरण हो जाय तो अच्छा। स्त्री-पुत्रोंके पालन-पोषणकी चिन्तामें मनुष्यकी सारी आयु बीत जाती है; पर परमात्माके भजनमें उसका मन नहीं लगता । स्त्री-माया ही संसार - वृक्षका बीज है । शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्धउसके पत्ते काम-क्रोधादि उसकी डालियाँ, पुत्र कन्या प्रभृति उसके फल हैं और तृष्णारूपी जलसे यह संसार वृक्ष बढ़ता है ।
लोह और काठकी बेड़ियोंसे चाहे कभी छुटकारा हो जाय, पर स्त्री-पुत्रादिकी मोहरूपी बेड़ियोंसे पुरुषका पीछा नहीं छूट सकता । जिनके मुँह देखनेसे पाप लगता है, स्त्री के लिये उन्हींकी खुशामदें करनी पड़ती हैं । किस्मत को देखो कि जिसने मनुष्यको कितना कमजोर बनाया, पर काम उससे दोनों लोकोंके लिये गये । उसे इस लोक और परलोक की फिक्र लगा दी । स्त्रीके वशमें होना सर्वनाश का बीज बोना है । - गर्दन पर बिखरे हुए बालों वाला करालमुखी सिंह, अत्यन्त मतवाला हाथी और बुद्धिमान् समरशूर पुरुष भी स्त्रियोंके आगे जो तुम्हारी बातें सुनना न चाहें, उनके गले मत पड़ो। विषयभोगों में सुख नहीं है। एक न एक दिन मनुष्यको इनसे अलग होना ही पड़ता है। अलग होनेके समय विषय-भोगीको बड़ा दुःख होता है ।
आत्मचिन्तन करो, पर आत्मचिन्तन करना सहज काम नहीं है। इसके लिये मनको वशमें करना होगा, उसे विषयोंसे हटाना होगा, उसे वृत्तियोंसे अलग कर एकाग्र करना होगा, तभी सफलता हो सकेगी । मूर्ख मनुष्य भाग्यपर संतोष नहीं करता, धनके लिये मारा - मारा फिरता है । जब कुछ हाथ नहीं लगता, तब रोता और कलपता है। यदि तू सुख-शान्तिसे जीवनयापन करना चाहता है तो तृष्णा पिशाचीके फंदेसे निकलकर भाग्यपर संतोष कर । अरी पामर तृष्णा! मैं तुझसे पूछता हूँ कि इतने कुकर्म कराकर भी तुझे संतोष हुआ या नहीं । सूर्य के उदय और अस्त के साथ मनुष्यों की जिन्दगी रोज घटती जाती है। समय भागा जाता है, पर कारोबारमें मशगूल रहनेके कारण वह भागता हुआ नहीं दीखता । लोगोंको पैदा होते, विपत्तिग्रस्त होते और मरते देखकर भी मन में भय नहीं होता।
इससे मालूम होता है कि मोहमयी प्रमादरूप मदिरा (शराब) के नशेमें संसार मतवाला हो रहा है । मनुष्य दूसरे को बूढ़ा हुआ तथा मरनेवाला देखता है, पर स्वयं यही समझता है मैं तो सदा जवान रहूँगा- अमर रहूँगा।यह अज्ञानी का लक्षण है। मनुष्यों ! मिथ्या आशा के फेर में दुर्लभ मनुष्य शारीर को यों ही नष्ट न करो ।




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