व्यंग्य
गढ़वा : यदि आप काले या सांवले हैं, आपके चेहरे पर दाग धब्बे हैं, आपको लोग पसंद नही करते हैं, आप अपने जीवन मे सफल होना चाहते हैं, तो लगाइए एफ एंड लवली जो देगी आपको बेदाग निखार, आपके चेहरे पर चार चांद लगा देगी, नया उमंग भर देगी आपके जीवन में, सबके चहेते बन जायँगे, लड़कियों/लड़कों की तो लाइन लग जायेगी।
इस क्रीम की महिमा ही ऐसी है, आपमें बदलाव आ जायेगा। सिर्फ एफ एंड लवली ही क्यों ढेरों ऐसे क्रीम है बाज़ार में। हाई डेफिनेशन चमक देने वाली क्रीम, फोर डी सफ़ेदी प्रदान करने वाली क्रीम, तुरन्त चमक देने वाली क्रीम, मल्टीविटामिन वाली क्रीम, पाउडर वाली क्रीम, जाड़े में चमक देने वाली क्रीम, सक्रिय प्रकाश देने वाली भी क्रीम, दिन के लिए क्रीम, रात के लिए क्रीम, दोपहर के लिए क्रीम, हर्बल क्रीम पता नहीं कैसे-कैसे क्रीम और कितने तरह के क्रीम? क्रीमों ने इतनी ख्याति बटोरी है की क्रीम को ले के यादव जी ने तो गाना तक बना दिया आप सबने तो सुना हीं होगा
"लगा के फेयर लवली जान.........."।
अपने बाबा ने भी बनायी है ढेर सारी क्रीम, ढेरों विदेशी कंपनियां भी हैं जो भारत में अपने तरह तरह के लुभाने वाले क्रीम बेच रहीं हैं। कई लोग तो आपको यूट्यूब पर भी मिल जायँगे ज्ञान बांचते, फलाना क्रीम, ढिमकना क्रीम बनाइये अदरक, लहसन, प्याज मिला के चेहरे पर लगाइये और गोरे हो जाइए। पैसा भी खूब है इस धंधे में। कई लोग खरबपति बन गए क्रीम बेच बेच के।
पर सोचने वाली बात है की आखिर क्यों, सब गोरे होने पे पड़े हैं। क्या हमें जो रंग रूप मिला है उस से संतुष्ट नहीं हैं। क्या ऊपर वाले ने कोई नाइंसाफी की है, लेकिन ये कैसे हो सकता है। श्री कृष्णा भी तो खुद सांवले ही हैं। एक भजन में सुना था कि वो भी पूछते हैं मइया से
" .......राधा क्यों गोरी, मैं क्यों काला......", तो फिर बाकी सब तो इंसान हीं हैं, पर शायद ये बचपना था या ये सब भी मानव दिमाग की उपज हो सकती है।
हमारे इसी फितरत का फायदा ये कंपनियां उठा रहीं है और अपनी जेबें भर रहीं हैं। पर क्या सच में ये सब क्रीमें फायदेमंद होती हैं?
इसका जबाब है- शायद नहीं। दुनिया में कोई भी ऐसी चीज नहीं बनी जो हमारे प्राकृतिक रंग को बदल दे। अगर है भी तो बेहद खतरनाक जिससे
"पॉप संगीत के किंग" कहे जाने वाले माइकल जैक्सन का देहांत तक हो गया। उन्होंने गोरा रंग पाने की लालच में अपना प्लास्टीक सर्ज़री कराया था, फिर भी हम क्यों पड़े हैं, गोरे और चमकदार चेहरे पाने के पीछे।
असल में काले और गोरे के बीच के अंतर की शुरुआत हुई थी उन्नीसवीं शताब्दी या शायद उस से भी पहले। जिसने मानवता का नस्लीय वर्गीकरण कर दिया। 1775 में जोहान ब्लुमेनबैच ने दुनिया की आबादी को त्वचा के रंग के अनुसार पांच समूहों में विभाजित किया, और बताया की गैर-यूरोपीयन लोग पतन की प्रक्रिया के माध्यम से उत्पन्न हुए हैं।
उन्होंने और बतया की पूरी दुनिया में सिर्फ दो तरह के लोग पाए जाते है -
"सुंदर गोरे और सफेद जाती के लोग" और
"बदसूरत काली जाती के लोग"। मीनर्स की किताब, द आउटलाइन ऑफ हिस्ट्री ऑफ मैनकाइंड में, दावा किया कि इंसानी जातियों के बीच मुख्य विशेषता होती है सुंदरता या कुरूपता। उन्होंने गोरे और सफेद जाति को लोगों को हीं सिर्फ सुंदर रूप का माना तथा काले लोगों को हीन, नीच, अनैतिक और पशु-समान माना, और भी बहुत सारे लोग हुए जिन्होंने काले गोरे का भेद हर समाज में उत्पन्न किया। हमेशा से काले/सांवले लोगों को हीन भावना से देखा जाता रहा है। उनके अधिकारों का हनन होता आया है।
पहले तो लोग इसे ही अपना किस्मत मान चुप रहते थे पर धीरे धीरे इसके खिलाफ आवाजें उठने लगे।
सावलें लोग भी गोरे होने के पीछे भागने लगे, तरह तरह के हथकंडे अपनाने लगे। उसी का नतीजा है कि ये सारी कंपनियां इतना फल फूल रहीं हैं और भोले भाले लोगों के बीच काले गोरे का भेद उत्पन्न रख माल माल कमा रही हैं।
कुछ दिन पहले अमेरिका में एक हादसा हुआ था। जिसमे एक काले इंसान की मृत्यु पुलिस की गलतीयों के करण हुई थी। जिसने बहुत असर दिखया। इस कोरोना काल के दौरान भी पूरी दुनिया में एक मुहिम शुरू हो गयी।
"ब्लैक लाइव्स मैटर"
जिसका असर हमारे देश में भी पड़ा एक दिग्गज कंपनी
"फेयर एंड लवली" ने अपना नाम बदल कर
"ग्लो एंड लवली" कर लिया, पर बिक्री नाम बदलने का बाद भी उसी तेज़ी से जारी रहेगी। इस मुहिम को सफल बनाने के लिए अन्य देशों ने भी साथ दिया और सबने मिलकर एक जंग की शुरुआत की है, जिस से ये अंतर मिट सके।
हमे आशा है की एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब ये मुहिम सफल होगा और लोग समझदार बनेंगे। लोगो को उनके काम और योगदान से पहचाना जाएगा न कि उनके रंग से।