गढ़वा : पूरे देश में लोकतंत्र का महापर्व चरम पर है। 13 मई को गढ़वा-पलामू के करीब 21लाख वोटर, 9 उम्मीदवारों में से अपना एक प्रतिनिधि चुन, दिल्ली भेजकर फिर अकाल, उग्रवाद, कुपोषण, पलायन, स्वास्थ्य व्यवस्था की घनघोर कमी, दूषित पेयजल, कोयल व सोन के कटाव से बर्बाद होते हजारों हेक्टेयर खेत, यूरिया एवं उन्नत बीज की कालाबाजारी, ट्रेनों की मारामारी और चार साल तक लेट चल रहे शैक्षणिक सत्र के साथ फिर अगले पांच साल ताकते रह जायेंगे।
पलामू के पहले सांसद और क्रांतिकारी नेता जेठन सिंह खरवार से लेकर चार बार की सांसद कमला कुमारी, तीन बार के सांसद ब्रजमोहन राम, लालू प्रसाद की राजद से एक ही कार्यकाल में दो सांसद (मनोज भुइँया एवं घूरन राम), बडे नक्सली नेता कामेश्वर बैठा और अभी दो बार से सबसे बडे पुलिस अधिकारी रहे बीडी राम तक, सब अपने कार्यकाल को सबसे बढिया और विकास की बरसात करने वाला बताते हैं।
लेकिन सच्चाई देखें तो
तारे जमीन पर आने जैसा है।
पलामू (अजा सुरक्षित) संसदीय क्षेत्र में छह विधानसभा क्षेत्र हैं। जिनमें डालटनगंज, हुसैनाबाद, विश्रामपुर, गढ़वा, भवनाथपुर सामान्य सीट और छत्तरपुर (अजा सुरक्षित) है। पलामू प्रमंडल की राजनैतिक आबोहवा लंबे समय तक इंदर सिंह नामधारी, चंद्रशेखर दूबे, अवधेश सिंह, गोपीनाथ- गिरिनाथ सिंह, यमुना सिंह, राधाकृष्ण किशोर के आसपास रही है।
झारखंड गठन के 10 साल बाद राजनीति नें करवट लिया और नये नये प्रयोग और नये समीकरण बने और पुराने ध्वस्त भी हो गये। राजनैतिक रूप से अबोध और नौसिखिए लोगों को संसदीय प्रणाली का अंग बनना इसी कालचक्र में हुआ।
नक्सलवाद के दौर में बडा नाम कामेश्वर बैठा के चुनावी रथ के सारथी बने पहले टर्म के विधायक भानुप्रताप शाही ने
सूखा पलामू भूखा पलामू का इमोशनल स्टेज तैयार कर, पहली बार किसी नक्सली नेता को देश के सर्वोच्चय पंचायत में पहुंचने में मदद किया।
हालांकि बदले हालात में छह महीने बाद ही भानु अपनी सीट हार कर अपनी साख खो बैठे।
गढ़वा से जातीय समीकरण को धत्ता बताते हुए गिरिनाथ सिंह चार बार से विधान भवन पहुंचते रहे। लेकिन इसी साल जातीय बयार को तेज कर ब्राह्मण बाहुल्य गढ़वा से एकदम नौसिखिए सत्येन्द्रनाथ तिवारी ने सारे पूर्वानुमान ध्वस्त कर दिया।
इसी चुनाव में एक नया और जिद्दी चेहरा गढवा में आया और चुपचाप काम करता गया। फ्लैक्स, बैनर, बडे-बडे कटआउट और होर्डिंग्स पहली बार नेता के नाम से लगा एवं धुंआधार दौरा और पूजा पंडाल, इफ्तार, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेलकूद, शादी-ब्याह में भागीदार बन कर चर्चित हुए मिथिलेश ठाकुर ने लोगों का ध्यान खींचा था।
राधाकृष्ण किशोर का दो बार दल-बदल और पलामू से दो बार की हार भी चर्चित रहा।
मोदी काल के आज इस आम चुनाव में दो बार भाजपा के सिंबल पर संसद पहुंचे बीडी राम के खिलाफ राजद ने एकदम नया नौसिखिए चेहरे पर दांव लगाया है।

चुनाव के रणभेरी काल में जहां मोदी के नाम और काम के शोर में स्थानीय सांसद की उपलब्धि या विफलता की चर्चा दब गई है, वहीं इंडी गठबंधन राज्य सरकार के साढ़े चार साल का कार्यकाल का ढोल पीट रही है। लोकसभा के चुनाव में मुद्दे गौण हो चुके हैं, वोटिंग तो मोदी सरकार को फिर से लाने और रोकने के लिए हो रहा है।