गढ़वा : हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था, किस्ती हमारी वहां डूबी जहां पानी कम था। लगभग 101 वर्ष पूर्व 1922 में स्थापित श्री कृष्ण गौशाला पर यह पंक्ति पूरी तरह से चरितार्थ होती है। गढ़वा के श्री कृष्ण गौशाला का एक समृद्ध गौशाला की नींव, तब दानवीर सनातन प्रेमी के द्वारा इस उद्देश्य से एक मजबूत नींव के सहारे खड़ा किया गया था कि आने वाली सनातन प्रेमियों की पीढ़ी इस गौशाला का जो सनातन धर्म में अप्रतिम महत्व है, उसके संकल्प के सहारे आगे बढ़ाएगी।
ऐसा इसलिए कि मैं जिस मजबूत नींव की बात कर रहा हूं, पहले उसे जान ले गढ़वा शहर के मध्य में स्थित बेशकीमती 8 एकड़ की जमीन को गौशाला के लिए दान देकर गौ माता की चारा की व्यवस्था के लिए 11.50 एकड़ अतिरिक्त भूमि चेतना में तथा ढाई एकड़ अचला नवाडीह में यानी 21 एकड़ भूमि दान देकर भगवान कृष्ण के नाम पर श्री कृष्ण गौशाला की स्थापना की गई थी।

स्थापना के उद्देश्यों के अनुरूप यह गौशाला चलती रही। 1980 के दशक तक लड़खड़ाते-लड़खड़ाते सनातन प्रेमियों के उदासीनता के कारण स्थापना के संकल्प के अनुरूप पूरी तरह से सक्रियता यहां नहीं रही, जिसका बेजा लाभ उठाते हुए 1990 के दशक में श्री कृष्ण गौशाला के इस बेशकीमती जमीन पर जिला प्रशासन की गीद्ध दृष्टि पड़ी।
इसमें गढ़वा नगर पालिका के सनातन प्रेम का ढोंग रचने वाले प्रतिनिधियों ने भी प्रशासन को सहयोग किया। परिणाम हुआ कि प्रशासन ने गौशाला के उद्देश्यों के विपरीत 1992 में बस स्टैंड के निर्माण के नाम पर बेशकीमती 8 एकड़ की जमीन का एक तिहाई हिस्सा लगभग सोनपुरवा बस स्टैंड के नाम पर बस स्टैंड निर्माण कर गौशाला की जमीन को हड़प लिया, यह कहना गलत नहीं होगा ऐसा इसलिए कि जिस समय बस स्टैंड का शिलान्यास किया जा रहा था, उस समय 1992 में गौशाला के तत्कालीन सचिव विजय केसरी तथा सदस्य नकछेदी प्रसाद ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ इसका कड़ा विरोध किया था।
मगर प्रशासन ने उक्त दोनों पर थर्ड डिग्री प्रयोग करते हुए हिरासत में लेकर उनकी जुबान बंद कर दिए था। गढ़वा के सनातन प्रेमियों का इनको साथ भी नहीं मिला। नतीजा रहा की गौशाला का जमीन का बड़ा भू-भाग उसके कब्जे से मुक्त हो गया। यहां यह जानकारी देना जरूरी है कि गढ़वा का तत्कालीन नगर पालिका प्रशासन की उसे जमीन पर कब्जा करने में अहम रोल "घर के भेदी लंका ढ़ाहे" जैसी रही। नगर पालिका प्रशासन के रोल के कारण जिला प्रशासन बस स्टैंड निर्माण करने में सफल रही।
हद तो तब पर कर गया, जब नगर पालिका प्रशासन तथा जिला प्रशासन ने श्री कृष्ण गौशाला समिति को आश्वासन दिया था कि इस बस पड़ाव का नाम श्री कृष्ण गौशाला के नाम पर श्री कृष्ण गौशाला बस पड़ाव गढ़वा सोनपुरवा रहेगा।
आश्वासन के अनुसार वहां बोर्ड भी लगाए गए। साथ ही यह भी आश्वासन मिला था कि बस पड़ाव से प्राप्त राजस्व के रूप में जो आमदनी होगी, उसका 50 फ़ीसदी हिस्सा श्री कृष्ण गौशाला के संचालन एवं विकास के लिए भुगतान किया जाएगा। इसकी भी शुरुआती दौर में कुछ हिस्सा दिए जाने का सूत्रों का दावा है, साथ ही वहां पर श्री कृष्ण गोशाला बस पड़ाव नामकरण का बोर्ड भी लगाया गया था। मगर नगर परिषद के प्रतिनिधियों के एकतरफा कार्रवाई के कारण इस पर भी अमल नहीं किया गया। सनातन प्रेमी की दुहाई देकर वोट मांगने वाले नगर परिषद के प्रतिनिधियों ने आश्वासन के अनुरूप न तो बस स्टैंड की कमाई की आधी राशि गौशाला को दिये और न हीं श्री कृष्ण गौशाला का नाम ही दिया ।
3 मार्च को तो हद हो गया क्योंकि सनातन प्रेमियों के छाती पर मूंग दलने के अंदाज में इसका नाम बदलकर श्री कृष्ण गौशाला के जगह पर अंतर राज्यीय बस स्टैंड करते हुए इसका भव्य उद्घाटन मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर की उपस्थिति में मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के द्वारा किया गया। इसमें श्री कृष्ण गौशाला समिति का विरोध को कुंद करने के लिए समिति के सचिव को बस स्टैंड के उद्घाटन के 10 घंटे पहले ही क्रिमिनल के साथ व्यवहार करने के अंदाज में हिरासत में लेकर शाम तक बस स्टैंड के उद्घाटन तक गढ़वा थाने में भूखे प्यासे बंद कर रखा गया।
यहां यह कहना अन्यथा नहीं होगा की बस स्टैंड निर्माण के समय का इतिहास प्रशासन द्वारा हिरासत में लिए जाने को दोहराते हुए समिति के सचिव रमेश कुमार दीपक को बंद कर दिया गया।
और वही गलती गढ़वा के सनातन प्रेमियों द्वारा इस बार भी दोहराई जा रही है। क्योंकि धर्म की दुहाई देकर राजनीतिक करने वाले तथा संगठन चलाने वालों की जुबान अब तक इस मामले में बंद है।