सगमा : - शरणागति प्राणियों के उद्धार का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। इसके जरिए जिस तरह से भगवान के द्वारा उद्धार किया जाता है वह अन्यत्र नहीं देखा जाता। प्रपत्ति के द्वारा परमात्मा समस्त प्राणियों के उद्धार का संकल्प लेते हैं। अन्यथा ज्ञान, वैराग्य, तपस्या, यज्ञ, दान व तीर्थ के द्वारा उद्धार करने की बात हो तो बहुत से लोग इससे वंचित रह जाएंगे। यह बातें
भैया रुद्र प्रताप देव उच्च विद्यालय सगमा के प्रांगन में आयोजित नव दिवसीय श्री शिव शक्ति महा यज्ञ के दौरान बुधवार को अपने प्रवचन के दौरान स्वामी शुखेण त्रिपाठी ने कहीं।
उन्होंने कहा कि प्रपत्ति का कोई मानक नहीं होता। प्रपत्ति या शरणागति का इतना महत्व है कि जो अधिकारी नहीं है उसे भी उद्धार का अधिकारी मानकर भगवान उद्धार कर देते हैं।
इंद्र का पुत्र जयंत मृत्यु दंड का अधिकारी होने के बावजूद शरणागति से सिर्फ एक आंख से वंचित होकर जीवनदान पा गया। हालांकि शरणागति की पात्रता होनी चाहिए। भोजन, उठन बैठन, खान पान, रहन सहन पवित्र होना चाहिए। ऐसा होता है तो भगवान निश्चित ही कृपा करते हैं। भगवतपाद रामानुजाचार्य स्वामी नहीं होते तो भक्ति का दुनिया में प्रचार नहीं होता। उन्होंने कहा कि ब्रह्म एक हैं। समय और जरूरत के मुताबिक भगवान ने अलग-अलग लीलाएं की। उसके आधार पर नारायण, राम, कृष्ण, बामन और नरसिंह आदि जैसे भगवान के अलग-अलग रूपों के आधार पर भेद नहीं करना चाहिए। कथा के क्रम में स्वामी जी ने कहा कि लोग आज साम्यवाद की बात करते हैं लेकिन भगवान श्रीराम ने त्रेता युग में साम्यवाद की स्थापना की थी।
स्वयं सब कुछ होने के बावजूद उन्होंने शबरी मैया से कहा कि तुम चाहोगी तो पंपा सरोवर के जल को पवित्र कर दोगी। भगवान की आज्ञा से ज्योंहि शबरी मैया ने पंपा सरोवर को अपने चरणों से स्पर्श किया उसका जल निर्मल हो गया।