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सुख की अंतिम सार संतुष्टि है और किसी के पास अपार धन होते हुए भी वह संतुष्ट नहीं है, तो समझिए कि वह दरिद्र है: जीआर स्वामी

location_on बंशीधर नगर access_time 17-Oct-23, 06:22 PM visibility 675
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सुख की अंतिम सार संतुष्टि है और किसी के पास अपार धन होते हुए भी वह संतुष्ट नहीं है, तो समझिए कि वह दरिद्र है: जीआर स्वामी


दिनेश पांडेय check_circle
संवाददाता



बंशीधर नगर : सुख की अंतिम सार संतुष्टि है और किसी के पास अपार धन होते हुए भी वह संतुष्ट नहीं है, तो समझिए कि वह दरिद्र है। संसार की सत्ता बाधक नहीं बल्कि उसकी महत्ता का असर बाधक है। महत्ता का असर होने से गुलामी आ जाती है। यह बातें मंगलवार को भागवत कथा के दौरान श्री जीयर स्वामी जी महाराज ने कही। श्री स्वामी जी ने कहा कि संसार का संयोग अनित्य और वियोग नित्य है। नित्य को स्वीकार करना मनुष्य का कर्तव्य है। संसार की जिन वस्तुओं को हम बड़ा महत्व देते हैं, उनका काम यही है कि वह हमें परमात्मा की प्राप्ति नहीं होने देंगे और खुद भी नहीं रहेंगे। संसार असत्य हो अथवा सत्य, पर उसके साथ हमारा संबंध असत्य है, यह नि:संदेह बात है। यह संसार मेहंदी के पत्ते की तरह ऊपर से हरा दिखता है, पर इसके भीतर परमात्मा रूपी लाली परिपूर्ण है।
हम स्वयं चेतन तथा अविनाशी हैं और सांसारिक वस्तुएं जड़ तथा विनाशी हैं। दोनों की जाती अलग-अलग है फिर दूसरी जाति की वस्तु हमें कैसे मिल सकती है। जैसे उदय होने के बाद सूर्य निरंतर अस्त की ओर जाता है, वैसे ही उत्पन्न होने के बाद संसार निरंतर अभाव की ओर ही जा रहा है। संसार विजातीय है और विजातीय वस्तु से संबंध होता ही नहीं, केवल संबंध की मान्यता होती है। संबंध की मान्यता ही अनर्थ का हेतु है, जिसके मिटते ही मुक्ति स्वत: सिद्ध है। शरीर संसार का निरंतर परिवर्तन हमें यह क्रियात्मक उपदेश दे रहा है कि तुम्हारा संबंध अपरिवर्तनशील तत्व के साथ है, हमारे साथ नहीं। हम तुम्हारे साथ और तुम हमारे साथ नहीं रह सकते। अभी जो वस्तुएं, व्यक्ति आदि हमारे पास हैं उनका साथ कब तक रहेगा।
इस पर हरेक को विचार करने की जरूरत है। हम शरीर को रखना चाहते हैं, सुख आराम चाहते हैं, अपने मन की बात पूरी करना चाहते हैं, यह सब असत्य का आश्रय है। वस्तु और व्यक्ति तो नहीं रहते पर उनसे माना हुआ संबंध बना है। वस्तु और व्यक्ति तो नहीं रहते पर उनसे माना हुआ संबंध बना रहता है। यह माना हुआ संबंध ही जन्म-मरण का कारण होता है। सब संसार अपनी धुन में जा रहा है। हम ही उसको पकड़ते हैं और फिर उसके छूटने पर रोते हैं। जो संसार की गरज नहीं करता उसकी गरज संसार करता है। परंतु जो संसार की गरज करता है उसको संसार चुसकर फेंक देता है। मनुष्य जब तक सांसारिक पदार्थों से संबंध रखेगा और उनकी आवश्यकता समझेगा, तब तक वह कभी सुखी नहीं होगा। संसार को सत्ता देने से संयोग-वियोग होते हैं और महत्ता देने से सुख-दुख होते है।
संसार की सामग्री संसार के काम की है, अपने काम की नहीं। संसार विश्वास करने योग्य नहीं, बल्कि सेवा करने योग्य है।




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