बंशीधर नगर :
बुधवार को प्रखंड कार्यालय के सभागार में प्रमुख उर्मिला देवी की अगुवाई में पंचायत समिति की बैठक हुई। इसमें मनरेगा, स्वास्थ्य, शिक्षा, जेएसएलपीएस, बाल विकास परियोजना, सहकारिता, कृषि रेशम कीट उद्योग बैंक, प्रधानमंत्री आवास योजना आदि विभागों के कार्यों की समीक्षा की गई तथा मनरेगा योजनाओं की जांच के लिए सदस्यों के द्वारा बीपीओ, कनीय अभियंता सहायक अभियंता एवं दो पंचायत समिति सदस्यों की एक जांच कमेटी बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया ।
बैठक में हैंडपंप, किसान क्रेडिट कार्ड, कन्यादान योजना, मुख्यमंत्री सावित्रीबाई फुले किशोरी समृद्धि योजना, वृक्षारोपण, बीज वितरण सहित विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की गई।
मौके पर उप प्रमुख गणेश प्रताप देव, सांसद प्रतिनिधि मुकेश चौबे, विधायक प्रतिनिधि लाल मोहन यादव, प्रखंड विकास पदाधिकारी श्रवण राम, अंचल अधिकारी अरुण कुमार मुंडा, प्रखंड सहकारिता पदाधिकारी मनोज कुमार, पंचायत समिति सदस्य मृदुला द्विवेदी, लालो खातून, सैयद अंसारी सहित सभी पंचायत समिति सदस्य, मौजूद थे।

प्रवचन
भगवत प्राप्ति का सरल उपाय क्रिया नहीं लगन है। अपनी प्राप्ति के लिए भगवान ने यदि जीव को मनुष्य शरीर दिया है, तो उसके लिए पूरी योग्यता और सामग्री भी साथ दी है। इतनी योग्यता और सामग्री दी है कि मनुष्य अपने जीवन में कई बार भगवत प्राप्ति कर ले। उत्कट अभिलाषा की कमी से ही परमात्म प्राप्ति में देरी लगती है, उद्योग की कमी से नहीं।
परमात्मा के साथ हरेक वर्ण, आश्रम, जाति, संप्रदाय आदि का समान रूप से संबंध है। इसलिए जो जहां है, वहीं परमात्मा को पा सकता है। यह बातें बुधवार को भागवत कथा के दौरान श्री जीयर स्वामी जी महाराज ने कही। श्री स्वामी जी ने कहा कि असत्य का आश्रय लेकर सत्य को प्राप्त करने की चेष्टा करना महान भूल है। जिसके लिए मनुष्य शरीर मिला है, उसकी प्राप्ति कठिन है, तो सुगम क्या है। जब तक अपने लिए कुछ करने और पाने की इच्छा रहती है, तब तक परमात्म तत्त्व का अनुभव नहीं हो सकता।
:- हठ व लग्न से मिलते हैं भगवान:- श्री स्वामी जी ने कहा कि उत्कट अभिलाषा जाग्रत न होने का मुख्य कारण सांसारिक भोगों की कामना है। सतयुग आदि में बड़े-बड़े ऋषियों को जो भगवान प्राप्त हुए थे, वे आज कलियुग में भी सबको प्राप्त हो सकते हैं।
परमात्मा की प्राप्ति में भाव की प्रधानता है, क्रिया की नहीं। भगवान हठ व लगन से मिलते हैं। परमात्मा की प्राप्ति में मनुष्य के पारमार्थिक भाव, आचरण आदि की मुख्यता है, जाति या वर्ण की नहीं। परमात्म प्राप्ति में विवेक, भाव और वैराग्य जितना मूल्यवान है, उतनी क्रिया मूल्यवान नहीं है। जब प्रत्येक क्रिया का आदि अंत होता है तो फिर उसका फल कैसे अनंत होगा। परमात्मप्राप्ति की उत्कट अभिलाषा न होने का खास कारण सांसारिक सुख की इच्छा, आशा और भोग है।