बंशीधर नगर : विश्ववन्द्य जगदाचार्य श्रीविष्वक्सेनाचार्य श्री श्री 1008 श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज के कृपा प्रसादप्रसादित परम शिष्य पूज्यपाद श्री श्री 1008 श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज का संकल्पित चातुर्मास्य व्रत श्री बंशीधर नगर (नगर उंटारी) के पाल्हे-जतपुरा गांव में गत 5 जून से प्रारंभ है।

इस निमित्त 12 जून (सोमवार) से सुबह 7 से 7'30 बजे तक मंगला आरती व संध्या बेला में 6 से 7 बजे तक श्री स्वामी जी के श्री मुख से कथा होगा। जबकि दूरदराज से आने वाले आगंतुक अतिथियों से सुबह में 6 से 8 बजे तक, दोपहर में 12 से 2 बजे तक व शाम में 6 बजे से रात्रि 8 बजे तक भेंटवार्ता व मिलने का समय निर्धारित है। इसकी सारी तैयारी यज्ञ समिति की ओर से पूरी कर ली गई है।
इसकी जानकारी देते हुए समिति अध्यक्ष वीरेंद्र चौबे व सचिव अनीश शुक्ला ने बताया कि मंगला आरती व कथा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु भक्तों को शामिल होने का अनुमान है। इसके लिए 80,000 वर्ग फीट में भव्य वाटरप्रूफ पंडाल का निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया है। 80000 वर्ग फीट में निर्मित पंडाल में 52,800 वर्ग फीट के प्रवचन पंडाल में 40,000 श्रद्धालु भक्तों जनों को बैठने की व्यवस्था की गई है। आगामी 23 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ का भी आयोजन किया गया है। यज्ञ स्थल पर आने वाले श्रद्धालु भक्तों के लिए शौचालय, यूरिनल, पेयजल आदि की सुदृढ़ व्यवस्था समिति की ओर से की गई है।
सुख की इच्छा करना ही दुख का कारण है:- श्री जीयर स्वामी
श्री जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि अपने लिए सुख की इच्छा करना ही दुख का कारण है।
जितना ही हम सुख सुविधा में रहना चाहेंगे उतना ही संसार में परेशानियां पैदा होगी और उतना ही कष्ट होगा। इसलिए सुख पाने के लिए अपने सुख की इच्छा का त्याग करना चाहिए। सुख की इच्छा आशा और भोग तीनों संपूर्ण दुखों के कारण हैं। ऐसा होना चाहिए ऐसा नहीं होना चाहिए इसी में सब दुख भरे हुए हैं। मन में किसी वस्तु की चाह रखना ही दरिद्रता है।लेने की इच्छा वाला सदा दरिद्र ही रहता है। मनुष्य को कर्मों का त्याग नहीं करना है प्रतीत कामना का त्याग करना है। मनुष्य को वस्तु गुलाम नहीं बनाती उसको इच्छा गुलाम बनाती है।यदि शांति चाहते हो तो कामना का त्याग करो। कुछ भी लेने की इच्छा भयंकर दुख देने वाली है। जिसके भीतर इच्छा है उसको किसी न किसी के पराधीन होना ही पड़ेगा।
अपने लिए सुख चाहना राक्षसी वृति है। संग्रह की इच्छा पाप करने के सिवाय और कुछ नहीं कराती।अतः इस इच्छा का त्याग कर देना चाहिए। कामना का त्याग कर दें तो आवश्यक बस्तुएं स्वतः प्राप्त होंगी।क्योंकि निष्काम पुरुष के पास आने के लिए बस्तुएं लालायित रहती है।जो अपने सुख के लिए वस्तुओं की इच्छा करता है उसको वस्तुओं के अभाव का दुख भोगना ही पड़ेगा।
सबसे बडा विपत्ति वह है जिसमें हम परमात्मा को भूल जाएं।
विपत्ति को विपत्ति नही, संपत्ति को संपत्ति नही समझना चाहिए। हमारे पास जो विपत्ति आता है तो महापुरूष लोग यह मानते हैं कि जो मैने किया था उसका मार्जन हो गया। ऐश्वर्य इत्यादि आया तो यह मानते हैं कि सुकृत कर्म कम हो गया ऐसा मानते हैं।
सबसे बडा विपत्ति वह है जिसमें हम परमात्मा को भूल जाएं। उनकी संस्कृति, संदेश को भूल जाएं। जिस विपत्ति में हमारे घर में,परिवार में रहन-सहन, उठन-बैठन, बोल चाल, खान पान, सब जहां बिगड़ जाए तो समझना चाहिए सबसे बड़ा विपत्ति यहीं है। यह विपत्ति का समाधान एक मात्र विनाश है। सर्वनाश के अलावा कोई दूसरा उपाय नही है। जहां भगवान नारायण की स्मृति हो जाय। घर परिवार की स्थिति थोड़ी दयनीय हो जाए। जिसने संकल्प ले लिया कि चोरी, बेईमानी, अनीति, अन्याय , कुकर्म, अधर्म नही करूंगा सबसे बड़ा श्रेष्ठ कर्म वह है। एक दिन वह परिवार ऊंचाई पर चढ़ेगा।