गढ़वा : कसौधन वैश्य समाज के गोत्र प्रवर्तक महर्षि कश्यप जी की जंयती के अवसर पर कसौधन वैश्य समाज गढ़वा के द्वारा रुकमणी साहून धर्मशाला में जंयती समारोह आयोजित किया गया।
इस मौके पर कसौधन वैश्य समाज के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक एवं राजनैतिक उन्नति का संकल्प लिया गया और इसकी सफलता के लिए प्रार्थना किया गया। समाज के अध्यक्ष उमेश कश्यप ने कश्यप मुनि के जीवनी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महर्षि कश्यप पिघले हुए सोने के समान तेजस्वी थे। उनकी जटाएं अग्नि-ज्वालाएं जैसी थीं। महर्षि कश्यप ऋषि-मुनियों में श्रेष्ठ माने जाते थे। सुर-असुरों के मूल पुरूष मुनिराज कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर था, जहां वे पर-ब्रह्म परमात्मा के ध्यान में मग्न रहते थे।
मुनिराज कश्यप नीतिप्रिय थे और वे स्वयं भी धर्म-नीति के अनुसार चलते थे और दूसरों को भी इसी नीति का पालन करने का उपदेश देते थे। उन्होने अधर्म का पक्ष कभी नहीं लिया, चाहे इसमें उनके पुत्र ही क्यों न शामिल हों। महर्षि कश्यप राग-द्वेष रहित, परोपकारी, चरित्रवान और प्रजापालक थे। वे निर्भिक एवं निर्लोभी थे। कश्यप मुनि निरन्तर धर्मोपदेश करते थे, जिनके कारण उन्हें ‘महर्षि’ जैसी श्रेष्ठतम उपाधि हासिल हुई। समस्त देव, दानव एवं मानव उनकी आज्ञा का अक्षरशः पालन करते थे। उन्ही की कृपा से ही राजा नरवाहनदत्त चक्रवर्ती राजा की श्रेष्ठ पदवी प्राप्त कर सका।
महर्षि कश्यप अपने श्रेष्ठ गुणों, प्रताप एवं तप के बल पर श्रेष्ठतम महाविभूतियों में गिने जाते थे।
महर्षि कश्यप सप्तऋषियों में प्रमुख माने गए हैं ।
मौके पर संगठन के संरक्षक पृथ्वीनाथ कश्यप मौके पर उपस्थित सचिव अमित कश्यप, संग़ठन मंत्री, धनंजय कशयप आदि मौजूद थे।