गढ़वा : मैं विश्रामपुर हूं। मैंने बड़े दूर्दिन देखे हैं। दूर्दिन की दुर्दशा झेलते-झेलते मैं थक चुका हूँ। पूरा मुल्क जब आजादी का जश्न मनाते हुए अपनी बेहतरी के सपने देख रहा था तो मैंने भी आजादी में सांस लेने और अपने निजाम में तरक्की का ख्वाब देखा था। लेकिन यह क्या 35 सालों तक आयातित रहनुमा मेरे किसी मुकम्मल ख्वाब को तो पूरा कर ही नहीं सके उन्होंने पानी के बिना मुझे बेपानी करके छोड़ दिया। अगर केवल पानी देकर मेरी प्यास बुझाने का प्रयास किया होता तो मैं अपने को धन्य समझता। युगों युगों से पानी के लिए सूख रहे मेरे हलक को केवल पानी दे दिया होता तो मेरी चुकती सांसों की डोर टूटने का डर नहीं सताता।
लेकिन 1952 से 1977 तक आयातित लोग मेरे पास आकर मेरा बेटा होने का स्वांग रचते रहे लेकिन नाम मात्रा की भी बेटी नहीं किया।
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तो मैंने सोचा कि हमारे गांव में कहा जाता है कि सटुआं भीत और पोसुआं बेटा पोस नहीं मानता तो क्यों नहीं अपनी रहबरी अपने बेटे को ही दी जाए। ऐसा सोचते ही बिल्ली के भागों सिकहर टूटा। 1977 में मेरे खुद के क्षेत्र का नाम विश्रामपुर हो गया। अब तो मैंने पक्के तौर पर सोच लिया कि अब हमारी पानी मेरा बेटा ही बचाएगा। दूसरे कोई पर भरोसा करना बेकार है। लगे हाथ मैंने करवट बदला और बिश्रामपुर के बेटे विनोद सिंह को अपनी रहबरी सौंप दी।
1977 में अपनी कमान अपने बेटे के हाथों में दी और 1980 में भी यह सोचकर की ढाई तीन साल का वक्त पर्याप्त नहीं होता बेटे को भी पूरा वक्त मिलेगा तभी तो विकास कर पाएगा। लगे हाथ 1980 में भी अपनी कमान बेटे को सौंप दी। लेकिन मैं अकेला नहीं था मेरे साथ नदिया के पार स्थित मेरा भाई मझिआंव भी था।
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8 वर्षों तक इंतजार करके मझिआंव ने भी तय कर लिया कि बिना अपने बेटे को कमान सौंपे अपनी बेहतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती। 1985 में मझिआंव ने करवट बदली और अपने बेटे चंद्रशेखर दुबे उर्फ ददई दुबे को अपनी रहनुमाई सौंप दी।
90 तक के वक्त को उसने भी कम माना। इसलिए 1990 में भी अपनी कमान अपने बेटे के हाथों में ही थमाए रखा। लेकिन 1995 तक भी मुझे पानी नहीं मिला। अपनी सोच बदली कहा गया है कि मूल से प्यारा सूद होता है। बस यही सोचकर बेटे की जगह 1995 में अपनी कमान दामाद को सौंप दी और तब इस क्षेत्र की रहनुमाई अपने यहां के दामाद रामचंद्र चंद्रवंशी के हाथों में थमा दी। 5 वर्ष इनको भी देखा। वही ढाक के तीन पात। फिर 2000 में बेटे के हाथों में इस विश्वास के साथ कमान सौंपी कि शायद इस बार हमारी चिरकाल की प्यास शायद बुझ जाए।
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फिर से 2000 में बेटे चंद्रशेखर दुबे उर्फ ददई दुबे को अपनी रहनुमाई सौंपी।
लेकिन गाड़ी जिस स्टेशन पर खड़ी थी वही की वहीं खड़ी रही। मुझे पानी नहीं मिलना था नहीं मिला। 2005 में फिर दामाद रामचंद्र चंद्रवंशी व 2010 में फिर बेटा ददई दुबे। इसके बाद 2015 एवं 2019 में फिर से मूल से प्यारे सूद को महत्व देते हुए इलाके के दामाद रामचंद्र चंद्रवंशी को अपनी कमान सौंप दी। लेकिन 27 वर्ष बेटा और 20 वर्ष दामाद कुल 47 वर्ष मूल और सूद को देखते गुजर गए। लेकिन आज तक हमारे हलक प्यासे के प्यासे हैं।