गढ़वा : श्री राम लला मंदिर में आयोजित राम कथा के पांचवें एवं छठे दिन की कथा बहुत ही खुशियों एवं दुःखों से भरा रहा। महाराज कृष्णकांत जी ने पांचवें दिन की कथा में राम विवाह प्रसंग पर श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि मां सीता धरती पुत्र थी। राजा जनक के घर में जो धनुष था, उसमें 10 हजार हाथियों का बाल समाहित था। राजा जनक जी ने सीता जी को झाड़ू देने के दौरान एक हाथ से उस धनुष को उठाने का दृश्य देख लिया था। सीता जी धनुष को इस तरह उठाई मानो कोई तिनका हो। उसके बाद राजा जनक ने यह प्रण ले लिया की जो इस धनुष का भंजन करेगा। वही सीता का वर बनेगा। उसी से सीता का विवाह कराया जाएगा। इसके लिए उन्होंने स्वयंवर आयोजित की। जिसमें देवता से लेकर दानव तक शामिल हुए।
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हजारों भुजाओं वाला सहस्त्रबाहु, तीनों लोकों का विजेता दशानन रावण भी स्वयंवर का हिस्सा बना। सैकड़ो बलशाली राजाओं के साथ दो बालक राम और लक्ष्मण ने भी स्वयंवर में भाग लिया। हालांकि इन दोनों कोमल कुमारों के स्वयंवर में प्रवेश के दौरान वहां उपस्थित घमंडी बलशाली राजाओं उनकी खिल्ली भी उड़ाई। कहा कि उनके सामने ये बच्चे क्या चीज हैं। ये क्यों यहां आए हैं। अपनी शक्ति एवं उभरी भुजाओं पर अभिमान करने वाले एक-एक कर सभी राजा धनुष को हिलाने में भी असफल रहे। राजा जनक इससे काफी दुःखित हो गए। उन्हें लगने लगा कि अब सीता को कोई वर नहीं मिल सकेगा। उसके बाद सभासद में उपस्थित राजाओं ने यह निर्णय लिया कि हम सभी मिलकर एक साथ धनुष का भंजन करेंगे और उसके बाद हम सब आपस में युद्ध करेंगे।
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अंत में जो बचेगा वही सीता का पति कहलाएगा। इस प्रसंग को सुन लक्ष्मण जी को रहा नहीं गया। वह मानो राम के प्रतिनिधि के रूप में राजा जनक से कहने लगे। हे राजन यह धनुष तो उनके लिए कुछ भी नहीं है। वह चाहें तो ब्रह्मांड को गेंद की तरह उठा लें और धरती को एक ही वाण में टुकड़े-टुकड़े कर दें। जनक जी को लक्षण जी की बातों पर तनिक भी भरोसा नहीं हुआ, परन्तु सीता जी को राम पर 100 प्रतिशत विश्वास हो गया था और वह राम को वर के रूप में मन ही मन वरण की कर लीं। उन्होंने धरती मैया से प्रार्थना किया कि कि मैया अब तुम्हारा आशीर्वाद ही इस यज्ञ को सफल बना सकता है। राजा जनक को व्यथित देख विश्वामित्र जी ने उनका ढाढस बढ़ाया और राम को धनुष भंजन की आज्ञा दी।
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राम के स्पर्श में आते ही धनुष खण्डित हो गया। स्वयंवर खुशियों से झूम उठा। सीता के साथ राम जी का विवाह हुआ। वहीं लक्ष्मण, भारत और शत्रुध्न का भी विवाह राजा जनक की अन्य पुत्रियों के साथ हुआ। इस विवाह की खुशियां अयोध्या में भी मनाई गई।
राम विवाह के अवसर पर रामलला मंदिर में एक झांकी निकाली गई और दिल खोलकर खुशियां मनाई गई। कथा के छठे दिन महाराज जी ने कहा कि अयोध्या में राम जी की ताजपोशी की तैयारी चल रही थी। उसकी तिथि तय हो गयी थी। निर्धारित तिथि की रात्रि पूर्व महारानी कैकई ने राजा दशरथ को उनके दो वरदान देने की बात याद कर दी और दो वर मांग डाली। पहला अयोध्या में उनके पुत्र भरत को राजगद्दी और दूसरा राम को 14 वर्ष को वनवास। राजा दशरथ ने भारत को अयोध्या का राजा बनाने की बात मान ली, किन्तु राम को वनवास भेजने की तुलना अपने प्राण से कर डाली।
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उन्होंने कहा कि राम उनके प्राण हैं। यदि वह वनवास जाते हैं तो उनके शरीर से प्राण ही निकल जाएगा। हालांकि महाराज जी ने कहा कि यह वरदान कैकई ने नहीं बल्कि स्वयं राम ने मांगी थी। राम ने पूर्व में ही मां कैकई से ये दो वरदान पिता जी से मांगने का वचन ले लिया था। चुकी कैकई राम से असीम प्यार करती थी। इसलिए राजा दशरथ से ये दो वरदान मांगे थे। यह जानते हुए की इसके बाद वह कलंकिनी मां के रूप में पहचाने जाएंगी। फिर भी उन्हें राम के लिए कुछ भी मंजूर था। राम जी के साथ माता सीता एवं भैया लक्ष्मण जी वनवास के लिए निकल पड़े। आगे उन्होंने निषाद राज के यहां रात्रि विश्राम किया एवं सुबह गंगा पार करने के लिए केवट से उनका दिन भर का संवाद होता रहा।
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केवट ने राम जी को गंगा पार करने से इनकार कर दिया। कहा कि आपकी पद धुली में इतनी शक्ति है कि पत्थर भी नारी बन जाती है। यदि आप नाव पर पैर रखते हैं तो उसकी नाव भी महिला बन जाएगी। इससे दो परेशानी होगी। एक तो उनकी पत्नी उसे बेवजह झगड़ा करेगी कि तुम दूसरी शादी कर लाया है। और दूसरी परेशानी उसके घर परिवार का संचालन नहीं हो पायेगा। क्योंकि एक मात्र नाव ही है उनके भरण पोषण का साधन। यह भी नारी हो गयी तो कमाई कैसे होगी। इसलिए वह अपने नाव पर तभी बैठाएगा जब आप अपना पैर परछालन कराएंगे। लक्ष्मण जी के गुस्से के बावजूद राम और केवट में लंबा संवाद चला।अंत में भगवान राम ने पैर परछालन की अनुमति दे दी। केवट ने अपने परिवारजनों, अन्य केवट के संतानों एवं अपने पुरखों के लिए राम जी का पैर धोकर उसे पिया, अन्य लोगों और अपने पुरखों को समर्पित किया।
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तत्पश्चात् भगवान राम को अपने नाव पर बैठकर गंगा पार किया। केवट ने भगवान से नाव का किराया नहीं लिया। कहा कि दोनों का काम एक ही है। एक केवट दूसरे केवट से भला किराया कैसे लेगा। राम ने पूछा दोनों का काम एक कैसे है। केवट ने बड़ा ही मार्मिक होकर कहा। हे प्रभु हम लोगों को गंगा पर लगाते हैं आप तो भवसागर पा लगाते हैं।
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कथा के छठे दिन मां दुर्गा की झांकी निकाली गई। मनमोहक झांकी के दर्शन के पश्चात भक्तगणों ने अपने आप को भक्ति संगीत एवं नृत्य में विभोर कर लिया। देखते ही देखते वहां का माहौल पूरी तरह भक्तिमय बन गया।
इस मौके पर रामलला मंदिर समिति के पदाधिकारी व सदस्य। कमलापुरी वैश्य समाज के पदाधिकारी एवं सदस्य तथा बड़ी संख्या में भक्तगण उपस्थित थे। इसकी जानकारी श्री रामलला मन्दिर समिति के सचिव धनंजय सिंह ने दी।