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पैसा दीजिए, बच्चों का नाम लिखाइए और घर बैठे डिग्री पाइए...

location_on गढ़वा access_time 19-Nov-23, 06:52 AM visibility 665
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पैसा दीजिए, बच्चों का नाम लिखाइए और घर बैठे डिग्री पाइए...
रंग और व्यंग्य


विवेकानंद उपाध्याय check_circle
संवाददाता



गढ़वा : अरे भाई सुना है, हरियाणा सहित कई राज्‍यों में शिक्षा माफिया को ले बड़ा खुलासा हुआ है। खुलासा ऐसा-वैसा नहीं 62 हजार फर्जी डिग्रियां बांटकर 180 करोड़ ठग लिया गया है, 11 शिक्षा माफिया को जेल के सलाखों तक पहुंचा दिया है। छोड़ो, अपने झारखंड को इससे क्या मतलब है? यहां तो राज्य गठन के 23 वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में भारी चमत्कार हुआ है। प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी विद्यालयों का मतलब वैसे पारा शिक्षक जिन्हें अपनी अस्तित्व की सुरक्षा के लिए सालों भर संघर्ष की चिंता रहती है। ऐसे में भूखे भजन ना होय गोपाला बच्चों को क्या पढ़ाएंगे विचार किया जा सकता है। जहां तक निजी विद्यालयों की बात है तो बहुतेरों की पहचान फुहर कहावत की तरह है।
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ऊपर से ठाट-बाट नीचे से मोकामा घाट, बच्चों का सूट-बूट बेहतर, पर इन्हें सफर करनी पड़ती है, रेलम-पेल खटारा बसों में, इन्हें वैसे शिक्षक पढ़ाते हैं, जिन्हें दरमाहा के नाम पर 5 से 15 हजार ही हाथ लगता है‌। ऐसे में निजी विद्यालयों की शिक्षा में गुणवत्ता की कहां तक गुंजाइश है, समझा जा सकता है। जमा दो की सामान्य शिक्षा बगैर शिक्षक के अपग्रेड विद्यालयों पर निर्भर है, तो डिप्लोमा, आईटीआई जैसी तकनीकी शिक्षा भी पीपीमोड पर, जिनकी हालत भी निजी विद्यालयों से बेहतर नहीं है। रही बात डिग्री का, तो इसका हाल ही कुछ और है। सरकारी विश्वविद्यालयों, कालेजों में शिक्षक नदारद, वहीं विद्यार्थी भी गदहे की सिंघ की तरह गायब हो चुके हैं। हां निजी विश्वविद्यालयों/डीम्ड यूनिवर्सिटी का नया झारखंड के शिक्षा के क्षेत्र में आविष्कार तो और ही चमत्कारी है।
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चमत्कार ऐसा-वैसा नहीं, पैसा दीजिए बच्चों का नाम लिखाइए और चकाचक सर्टिफिकेट घर बैठे पाइए की नीति पर हमारी सरकार सरपट दौड़ा रही है। यह हरियाणा थोड़े ना है, अपना झारखंड में सब ठीक-ठाक है। हमारी सरकार फर्जी डिग्री बांटनेवालों को पनिशमेंट नहीं रिवॉर्ड दे रही है। देख नहीं रहे हो, सरकार को लगा की आबादी के बढ़ने से पढ़ने वालों की संख्या बढ़ रही है, उपर से पड़ोसी राज्यों के वैसे बिगड़ैल बच्चे जिन्हें अपने राज्यों में बगैर पढ़े डिग्री नहीं मिल पा रही है, डिग्री पाने की प्रत्याशा में झारखंड की ओर तक झांक कर रहे हैं। इसे ध्यान में रखकर भी सरकार ने फटाफट शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम उठाए। सरकारी विश्वविद्यालयों के नहीं शक पाने के कारण डीम्ड यूनिवर्सिटी के नाम पर धड़ाधड़ निजी विश्वविद्यालय खोलवाकर डिग्री आसान कर दिया है।
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आसान भी ऐसा-वैसा नहीं, जहाँ चाहो, जो डिग्री चाहो एबीसीडी यथा डी फार्मा, बी फार्मा, आईटीआई, टेक्निकल, जनरल जैसा भी सर्टिफिकेट चाहिए। बहुत ज्यादा मगजमारी नहीं करनी है। पैसा-पैसा, आईए पैसा दीजिए बच्चों का नाम सामान्य हो या तकनीकी शिक्षा किसी में लिखा दीजिए। दिल्ली, गुजरात, मुंबई कहीं भी जॉब कीजिए अथवा घर बैठे व्यवसाय सिर्फ व सिर्फ परीक्षा देने की जहमत उठाना है। परीक्षा हाल में मोबाइल इंटरनेट की पूरी छूट मिलेगी जिसके सहारे उत्तर पुस्तिका भर देना है। विशेष परिस्थिति हो तो गुजरात, असम कहीं भी बैठे हो, भाई-भतीजा, रिश्तेदार को अपने बदले परीक्षा में बैठा दें, परीक्षा भी संपन्न हो जाएगी और आप कहीं भी हो जिस अभिभावक ने आपके बदले पैसा खर्च किया है उसके हाथ में पास आउट का डॉक्यूमेंट भी मिल जाएगा।
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कुछ लोगों के मन में यह सवाल हो सकता है कि आखिर हरियाणा सरकार के फर्जी डिग्री जांच से हमारे झारखंड की शिक्षा व्यवस्था का क्या मतलब है? यहां तो शिक्षा के मौलिक अधिकार के तहत बच्चे प्राथमिक शिक्षा सरकारी विद्यालयों में फ्री तथा निजी विद्यालयों में गरीबी रेखा के नीचे के बच्चे 25 प्रतिशत फ्री एजुकेशन कागज पर ही सही पर पा ही रहे हैं। यहां गुणवत्ता का सवाल जानना हो तो जरा एएसईआर के 2011 के रिपोर्ट को भी जान लीजिए, झारखंड में 8 से 11 साल के आधे बच्चे एक मामूली पैराग्राफ पढ़ने में भी असमर्थ हैं। झारखंड के एक-तिहाई से भी ज्यादा प्राथमिक स्कूलों और बीस फीसदी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सिर्फ एक ही शिक्षक है, जबकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के मुताबिक, सभी स्कूलों में कम से कम दो शिक्षक होने चाहिए।
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बावजूद, अपने मुंह मियां मिट्ठू बनकर शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के दावे करने से पहले सुनिश्चित करना होगा की फर्जी डिग्री देने के बजाय बच्चों की उपस्थिति शिक्षण संस्थानों में सुनिश्चित किया जाए। झारखंड में परीक्षा में कदाचार के लिए जो कड़ा कानून कागज में बना दिया गया है। उसे जमीन पर उतारा जाए, ताकि बच्चे परीक्षाओं में मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल कर परीक्षा में चोरी कर डिग्री हासिल नहीं करें। वरना वह दिन दूर नहीं जब झारखंड राज्य के शिक्षण संस्थानों की डिग्रियों को दूसरे राज्य फर्जी बताकर हमारे नौनिहालों के रोजगार के दरवाजे सदा के लिए बंद कर दें। ऐसी आशंका बेवजह नहीं है। जरा याद कीजिए 1970-80 के दशक में एकीकृत बिहार के मगध विश्वविद्यालय के बच्चे नौकरी रोजगार की बात तो दूर उच्च शिक्षण संस्थानों में नामांकन के लिए भी अपने ही राज्य के दूसरे विश्वविद्यालय में जाते थे तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता था कि उनकी डिग्री परीक्षा में चोरी के आधार पर प्राप्त किया हुआ फर्जी है।
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