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राष्ट्रीय सांस्कृतिक जत्था को लेकर गढ़वा जिले के विभिन्न सांस्कृतिक-सामाजिक संगठनों ने किया प्रेस कॉन्फ्रेंस

location_on गढ़वा access_time 04-Oct-23, 09:05 PM visibility 687
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राष्ट्रीय सांस्कृतिक जत्था को लेकर गढ़वा जिले के विभिन्न सांस्कृतिक-सामाजिक संगठनों ने  किया प्रेस कॉन्फ्रेंस


संजय कुमार यादव check_circle
संवाददाता



गढ़वा : गढ़वा 04 अक्टूबर बुधवार को ढाई अक्षर प्रेम, इप्टा की राष्ट्रीय सांस्कृतिक जत्था को लेकर गढ़वा जिले के विभिन्न सांस्कृतिक-सामाजिक संगठनों ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विस्तृत जानकारी दी। इप्टा के संजय तिवारी के साथ अशर्फी चंद्रवंशी, योगेंद्र नाथ चौबे, नमस्कार तिवारी, वीरेंद्र राम, जिला परिषद सदस्य धर्मेंद्र सिंह, गौतम ऋषि एवं अनवर झंकार आदि ने संयुक्त रूप से बताया कि ढाई अक्षर प्रेम के नाम से बंधुता, समता, न्याय और प्रेम का संदेश बांटने के लिए हिंदुस्तान भर के कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों एवं बुद्धिजीवियों के विभिन्न संगठनों ने भगत सिंह के जन्मदिन 28 सितंबर से गांधी के शहादत दिवस 30 जनवरी तक एक लंबी सांस्कृतिक पदयात्रा का आयोजन किया है. जो राजस्थान के अलवर से शुरू होकर 22 राज्यों से गुजरते हुए 30 जनवरी 2024 को गांधीजी के शहादत दिवस पर दिल्ली में समाप्त होगी।
झारखंड में यह जत्था 8 दिसंबर से 12 दिसंबर तक चलेगी. इसके पूर्व गढ़वा जिले में प्रतीकात्मक तौर पर 5 सितंबर दिन बुधवार को स्थानीय इप्टा के नेतृत्व संस्कृतिकर्मी सामाजिक संगठनो के साथ मिलकर गढ़वा से खजूरी, आमर, बाकोईया, माझीगाँव, करमडीह, खरसोता होते हुए उटारी रोड तक पदयात्रा करेंगे. प्रेस कॉन्फ्रेंस में इप्टा के संजय तिवारी ने कहा कि हम लोगों के बीच जाएंगे, उनसे मिलेंगे और उनके जीवन, कला और संस्कृति के बारे में जानेंगे। कलाकार नफरत फैलाने वालों से नफरत करते हैं. ग़लत को ग़लत कहना ही सही है। हम कबीर की तार्किकता के साथ उनके ढाई आखर प्रेम के मार्ग पर चलते हुए प्रेम और अनुराग का संदेश लोगों तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं. यह जत्था दूसरे अर्थों में उस भारत की खोज भी है जिसकी अभिव्यक्ति हमारे संविधान में वर्णित आदर्शो में अंतर्निहित है. जो जाति, भाषा और लिंग से ऊपर उठकर समस्त भारतीय जनता के समानता की घोषणा करता है. आज जब मुल्क में धर्म और संस्कृति की रक्षा के नाम पर नफरत के बीज बोए जा रहे हैं. इप्टा की यह सांस्कृतिक जत्था नफरत, हिंसा और वर्चस्व की इस घटाटोप अंधेरे में प्रेम के उस ज्योति की तलाश में निकला है जो गांधी और भगत सिंह का रास्ता था, जो रास्ता कबीर, रैदास, मीरा, रसखान और नानक से होते हुए ज्योतिबा फुले के संघर्ष और अंबेडकर के समतामूलक विचार तक जाता है. 28 सितंबर से शुरू हुआ ढाई आख़र प्रेम सांस्कृतिक जत्था प्रेम और अनुराग का संदेश बांटते हुए 30 जनवरी तक हिंदुस्तान के किसी कोने में निरंतर मौजूद रहेगा. इस जत्था में जितनी दूर तक हो सके हमारे साथ चलिए... गढ़वा जिले के सांस्कृतिक जत्था में इप्टा के साथ ज्ञान विज्ञान समिति, जन संस्कृति मंच, एकता सत्य संघ, नई चेतना आदि संगठन सक्रिय रूप से शामिल होंगे।




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