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इन्द्रियों के दमन से व्यक्ति बनता है यशस्वी-जीयर स्वामी

location_on बंशीधर नगर access_time 14-Aug-23, 06:21 PM visibility 670
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इन्द्रियों के दमन से व्यक्ति बनता है यशस्वी-जीयर स्वामी


दिनेश पांडेय check_circle
संवाददाता



बंशीधर नगर : -प्रखंड के पाल्हे जतपुरा ग्राम में चल रहे प्रवचन में श्री श्री जीयर स्वामी महाराज ने कहा कि इन्द्रियों के दमन से व्यक्ति यशस्वी बनता है .धर्म की रक्षा करने वालों की रक्षा धर्म करता है, कहीं भी जायें, वहां से दुर्गुण और अपयश लेकर नहीं लौटें. उत्पन्न परिस्थितियों में अपने विवेक से निर्णय लें, जिससे भविष्य कलंकित न हो पाये. प्रयास हो कि वहाँ अपने संस्कार संस्कृति एवं परम्परा के अनुरूप कुछ विशिष्ट छाप छोड़कर आयें, ताकि तत्कालिक परिस्थितियों के इतिहास में आप का आंकलन विवेकशील एवं संस्कार संस्कृति संरक्षक के बतौर किया जा सके. उन्होंने भागवत कथा के प्रसंग में इन्द्रियों के निग्रह की चर्चा की. इन्द्रियों को स्वतंत्र छोड़ देने से पतन निश्चित समझें.एक बार अर्जुन इन्द्रलोक में गये हुए थे. वहाँ उर्वशी नामक अप्सरा का नृत्य हो रहा था.नृत्य के पश्चात् अर्जुन शयन कक्ष में चले गये. उर्वशी उनके पास चली गयी. अर्जुन ने आने का कारण पूछा. उर्वशी ने वैवाहिक गृहस्थ धर्म स्वीकार करने का आग्रह किया. अर्जुन ने कहा कि मृत्यु लोक की मर्यादा को कलंकित नहीं करूँगा. उर्वशी एक वर्ष तक नपुंसक बनने का शाप दे दिया.अर्जुन दुर्गुण और अपयश लेकर नहीं लौटे. उर्वशी का शाप उनके लिए अज्ञातवाश में वरदान सिद्ध हुआ. स्वामी जी ने कहा कि 'धर्मो रक्षति रक्षितः.यानी जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा धर्म करता है.जो धर्म की हत्या करता है, धर्म उसकी हत्या कर देता है. 'धर्म एव हतो हन्ति. इसलिए धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिये. स्वामी जी ने कहा कि जो हमारे पाप, अज्ञानता और दुःख का हरण करे, वो हरि है.वेदांत दर्शन की बात की जाए तो संसार में आने का मतलब ही होता है, कि इसमें रहना नहीं है. परिवर्तन का नाम संसार है. आश्चर्य है कि ऐसा जानकर भी जीव स्थायी ईश्वर को भूल नश्वर संसार में आसक्त है. जैसे घुमते चाक पर बैठी चीटी और ट्रेन के यात्री कहें कि हम तो केवल बैठे हैं, यह उचित नहीं, क्योंकि शरीर से श्रम भले न लगे लेकिन यात्रा तो तय हो रही है. मन से ईश्वर के प्रति समर्पण से वे रक्षा करते हैं.अत्यधिक सम्पति और संसाधन के लिए न करें अपराध. भगवान की मूर्ति को अपलक निहारते हुए लगाएं ध्यान.जीवन निर्वहन के क्रम में अपनी आवश्यकताओं को कम करते हुए न्यूनतम साधन एवं संसाधनों का उपयोग करना चाहिए. इसी में स्वहित एवं राष्ट्रहित समाहित है. वस्तुओं का अत्यधिक मात्रा में उपयोग से उनका दुरूपयोग होता है, श्री स्वामी जी ने कहा कि खाली पात्र में ही जल या वस्तु डाली जा सकती है. भरे हुए पात्र में कुछ डालने पर वह गिरने लगता है. उसी तरह अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं को जरूर पूर्ति करनी चाहिए, लेकिन विलासितापूर्ण जीवन जीने के लिए अनीति अत्याचार से धन नहीं जुटाना चाहिए.समाज में ऐसे -कभी दूध पीना छोड़कर माता को अपलक निहारने लगता है. स्वामी जी ने कहा कि मुक्ति पाँच तरह की होती है. भगवान के लोक में रहना सालोक्य मुक्ति, भगवान के पास रहना सामीप्य मुक्ति, भगवान के समान रूप बनाना सारूप्य मुक्ति, भगवान के समान सृष्टि का अधिकारी सासृष्ट मुक्ति और भगवान में अपने को विलय करना सायुज्य मुक्ति कहलाता हैं. इन मुक्तियों के अधिकारी भी भगवान के अधीन रहते हैं. भक्ति योगः जिस व्यवहार, आचरण और कर्म से भगवान के प्रति निष्ठा हो जाए वही भक्ति है.




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