गढ़वा : गढ़वा विधानसभा की भाजपा की राजनीति में पहले से ही चल रही सत्येंद्रनाथ, गिरीनाथ तथा अलखनाथ के घमासान के बीच एक नया अवतार राजीव राज के रूप में हुआ है।
भाजपा की राजनीति में राजीव राज की इंट्री दुर्गा पूजा की शुभकामना पोस्टर से शुरू होकर दीपावली, छठ जैसे पर्व त्यौहार के नाम पर शुभकामना अवतार के रूप में हुआ है, जिसमें कार्यकर्ताओं के बीच पोस्टर में फोटो ग्लैमर के माध्यम से स्वीकारोक्ति एवं आम लोगों के बीच पहचान बनाने की ख्वाहिश राजीव राज की कुलांचे मार रही है। परंतु गढ़वा जैसे पिछड़े इलाके में जहां नेताओं की पहचान राजनीतिक पार्टी के साथ-साथ आम लोगों से व्यक्तिगत संबंध के आधार पर परिणाम तक पहुंचाने की रही है, उसमें राजीव राज का पोस्टर फोटो ग्लैमर की आकाशबेवर राजनीति कितना कारगर साबित होगा, यह तो आने वाला वक्त तय करेगा, मगर इतना साफ हो चुका है कि गढ़वा विधानसभा के राजनीति में सत्येंद्रनाथ तिवारी, गिरिनाथ सिंह तथा अलखनाथ पांडेय के अलावा एक चौथा दावेदार भी राजीव राज तिवारी के रूप में अभी से दस्तक दे चुका है।
भाजपा नेता राजीव राज के चल रहे प्रयास से कम से कम इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है।
वैसे भी राजनीत कब किसके पक्ष में करवट लेगा इसका अंदाज लगाना आसान नहीं होता, पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि गढ़वा विधानसभा की भाजपा की राजनीति में आने वाले चुनाव में दावेदारों की संख्या विगत चुनाव की अपेक्षा तेजी से बढ़ रही है। ऐसा इसलिए कि भाजपा के लिए दशकों से सुखी पड़ी गढ़वा विधानसभा की राजनीति में कमल खिला कर सत्येंद्र नाथ तिवारी ने भाजपा राजनीति की जमीन को उर्वरा और उम्मीद भरा बना दिया है। लिहाजा भाजपा की राजनीति में गढ़वा विधानसभा क्षेत्र से टिकटार्थियो के दौड़ में पिछले चुनाव में जहां सत्येंद्रनाथ अलखनाथ, बालमुकुंद सहाय तथा भगत सिंह जैसे दावेदारों की चर्चा थी, वहीं अभी से दावेदारों की संख्या जिस रफ्तार से से बढ़ रही है।
वैसे में आने वाला गढ़वा विधानसभा चुनाव क्षेत्र से भाजपा के टिकट के हिसाब से उक्त दावेदारों के लिए आसान नहीं होगा।
जहां तक भाजपा की राजनीति में उक्त चारों प्रमुख नेताओं की कद काठी का सवाल है तो एक तरफ दो बार लगातार विधायक रहे सत्येंद्र नाथ हैं, तो दूसरी तरफ राजनीति के माहिर खिलाड़ी रहे चार-चार मर्तबा विधायक रहे बिहार सरकार के पूर्व मंत्री गिरिनाथ सिंह। अलखनाथ भी एक मर्तबा भाजपा के टिकट पर किस्मत अजमा चुके हैं। ऐसे में राजीव राज तिवारी की ग्लैमरस दावेदारी कितनी कारगर साबित होगी, यह तो आने वाला वक्त तय करेगा।
वैसे इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि गढ़वा विधानसभा की राजनीति जमीन के हिसाब से राजीव राज तिवारी की पहचान भले ही फिलहाल कमजोर दिख रही है, मगर भाजपा की राजनीति में राजीव राज को भी कमतर आंकना सही नहीं होगा।
क्योंकि दिल्ली के जेएनयू की राजनीति से लेकर रांची के बड़े नेताओं के बीच पहचान के भूखे नहीं है। राजीव राज के संदर्भ में भाजपा की राजनीति में यह भी कहा जा सकता है कि इनका राजनीति का आधार ऊपरी नेताओं से जान पहचान से ही है। ऐसी परिस्थिति में गढ़वा भाजपा की राजनीति में दावेदारों के बीच चल रही गुथम-गुत्थी के बीच राजीव राज तिवारी की एंट्री भी भाजपा की गढ़वा विधानसभा की राजनीति के लिहाज से नई चर्चा को जन्म दे दिया है, इतना तो स्वीकार किया ही जा सकता है।