गढ़वा: इस वैश्विक महामारी कोरोना काल में समाज का सभी तबका संवेदनशील दिख रहा है। कोरोना के जद में पीड़ा झेल रहे लोगों के सहयोग में सामाजिक संगठन से लेकर व्यक्तिगत तौर पर सैकड़ों हाथ लोगों की मदद के लिए आगे बढ़ रहे हैं। मगर सरकारी सिस्टम है, जो फाइलों में सिमटकर खूब लंबी चौड़ी आंकड़े को तो समेटे हुए है, मगर जमीन पर वैसा नहीं होता नहीं दिख रहा है। कम से कम पीडीएस सिस्टम को लेकर तो ऐसा ही कहा जा सकता है।
भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी इस सिस्टम में ऐसी ढिठाई है की कोरोना संकट में केंद्र व राज्य सरकार द्वारा गरीबों को पेट भरने के लिए अनाज पहुंचाने की महामारी अभियान में भी संवेदनशील नहीं दिख रहा है या यों कहें कि फिलहाल इस सिस्टम से जुड़े लोगों के चांदी ही चांदी है।
हालत यह है कि आए दिन पीडीएस सिस्टम से जुड़े उपभोक्ताओं का दर्द जन वितरण प्रणाली के विक्रेता द्वारा कम अनाज देने के कारण, तो कभी 2 महीने का अनाज पर अंगूठा लगवाकर 1 महीने का अनाज गोलमाल करने, निर्धारित दर से ज्यादा कीमत वसूलने और कम मात्रा में अनाज देने, यहां तक कि खाद्यान्न में मिलावटी करने को लेकर हंगामा एवं शिकायतों का दौर जो चला है, वह कोरोना संक्रमण की तरह तेजी से फ़ैल रहा है।
जहां तक परेशानी को लेकर शिकायत का प्रश्न है, इसके लिए पीडीएस सिस्टम के तहत निर्धारित टेलीफोन सेवा से शिकायत सीधे अधिकारियों तक तो निरंतर पहुंचता है, मगर उसका निपटारा भी फाइलों में ही सिमट कर दबा जाता है। ऐसा इसलिए कि जन वितरण प्रणाली व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार की ओर से भले ही डोर स्टेप डिलीवरी, मशीन से अनाज वितरण, जन वितरण प्रणाली की दुकान के बाहर भंडारण की इंट्री जैसे कई सुधार के तौर-तरीके अपनाए गए मगर यह सारा तौर तरीका भी अधिकारियों के फाइल में ही सिमट कर रह जाता है।
लिहाजा जमीन पर स्थिति ज्यों की त्यों बनी रहती है, क्योंकि जिस प्रशासनिक तंत्र को सुधारने की जिम्मेवारी है, वह गड़बड़ी की शिकायतों में आईवाश से ज्यादा पता नहीं किस मजबुरी में कार्रवाई के लिए तैयार हैं। ऐसा नहीं तो फिर क्या कारण है कि आए दिन शिकायत मिलने के बावजूद दोषी जन वितरण प्रणाली के दुकानदारों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती? यही वह महत्वपूर्ण सवाल है जिसमें जन वितरण प्रणाली व्यवस्था से जुड़े हाकिम की ओर इशारा करता है।
अक्सर यही देखने को मिलता है कि किसी डीलर को सजा के नाम पर कुछ दिनों के लिए निलंबित किया गया फिर उसे बहाल कर दिया गया।
इसी का परिणाम सामने है कि कोरोना संकट को कमाई का बेहतर अवसर की तरह इस्तेमाल पीडीएस सिस्टम से जुड़े लोग कर रहे हैं, क्योंकि इन्हें अनाज का आवंटन इस कोरोना काल में करीब डेढ़ गुणा अधिक मात्रा में मिल रहा है। तभी तो हालत ऐसी है कि इस कोरोना संकट में जहां लोग मानवीय संवेदना के आधार पर जरूरतमंदों की मदद में अपने निजी कमाई लगा रहे हैं, वही जन वितरण प्रणाली के विक्रेता दाल में प्लास्टिक मिलाकर लोगों के जिंदगी के साथ खिलवाड़ तक करने में परहेज नहीं कर रहे हैं।
इसके बाद भी यदि ऐसे डीलरों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं हो रही है तो आखिर क्या कारण है, इस पर गौर करने की जरूरत है। ऐसे में यह साफ है कि पीडीएस सिस्टम में डीलर तो आखरी पायदान पर है, इससे जुड़े पूरा सिस्टम उपर से नीचे तक क्रप्ट है।
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