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निजी स्कूल के मामले में सरकार का फैसला अदूरदर्शी, कमजोर निजी स्कूलों व कर्मियों को किया गया नजरअंदाज

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access_time 11-06-2020, 11:02 AM


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सांकेतिक तस्वीर


विवेकानंद उपाध्याय
चैनल हेड, नूतन टीवी

गढ़वा: लंबे इंतजार के बाद झारखंड सरकार ने लॉकडाउन के दौरान निजी स्कूल के द्वारा अभिभावकों से फी लेने के मामले में जो फैसला सुनाया है, उस फैसले में सरकार ने निजी स्कूल कर्मियों और पिछड़े इलाके तथा कमजोर स्कूलों को पूरी तरह से नजरअंदाज तो किया ही है, साथ ही सरकार के इस फैसले से अभिभावकों को बहुत राहत नहीं मिलने वाली है। क्योंकि स्कूल बंद के समय वैसे भी अधिकांश विद्यालय परिवहन फी अभिभावकों से नहीं लेते हैं। ऐसे में सरकार के इस फैसले से निजी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने वाले अभिभावकों के हाथ बहुत कुछ नहीं लग पाया है। निजी स्कूल के मामले में सरकार का फैसला दिन भर चले ढाई कोस वाली उक्ति को चरितार्थ कर रहा है। क्योंकि सरकार का यह फैसला जिस हिसाब से समग्र में होनी चाहिए थी, वैसा बिल्कुल ही नहीं है। ऐसा इसलिए कि सरकार ने फैसला लेने से पहले निजी स्कूलों में कार्यरत कर्मियों को ध्यान में बिल्कुल ही नहीं रखा। सरकार को चाहिए था कि जिस प्रकार से निजी स्कूल प्रबंधन अभिभावकों के प्रतिनिधि को पक्ष रखने का मौका दिया, उसी प्रकार से निजी स्कूलों से जुड़े कर्मियों को भी पक्ष रखने का मौका देना चाहिए था। यदि सरकार ने ऐसा नहीं भी किया तो सरकार के फैसले में निजी स्कूलों को फी वसूली के फैसले में यह शर्त लगाने की जरूरत थी कि वही स्कूल फी लेने के अधिकारी होंगे, जिनके द्वारा संबंधित विद्यालय में कार्यरत कर्मियों को शत - प्रतिशत लॉकडाउन अवधि का वेतन का भुगतान किया गया हो। क्योंकि इस लॉकडाउन के दौरान निजी स्कूलों के कर्मियों के प्रबंधन द्वारा वेतन का भुगतान नहीं कर उन्हें उनके हाल पर, संकट के इस घड़ी में जीने के लिए छोड़ दिया गया है, जैसी शिकायतें निरंतर मिल रही है। जहां तक शिक्षा विभाग द्वारा ट्यूशन फी में 2 महीने के अतिरिक्त लॉकडाउन के समय का ट्यूशन फी, वैसे ही विद्यालयों से वसूलने का शर्त लगाया गया है कि, जो ऑनलाइन पढ़ाई कराए हैं। सरकार का यह शर्त भी पूरी तरह से अदूरदर्शितापूर्ण लगता है। क्योंकि ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर कुछ एक विद्यालयों को छोड़कर अधिकांश ने सिर्फ खानापूर्ति किया है। ऐसे में ऑनलाइन पढ़ाई का सरकार निजी स्कूलों के प्रबंधन से कैसे प्रमाण पत्र लेगी तथा तय करेगी कि, कौन सा विद्यालय वास्तव में ऑनलाइन पढ़ाई कराया है, और कौन सा विद्यालय नहीं कराया है? सरकार ने ऑनलाइन पढ़ाई कराने के शर्त के दौरान शायद इस बात का ध्यान नहीं रखा कि झारखंड में छोटे शहरों व सुदूरवर्ती इलाकों में कुकरमुत्ते की छत्ते की तरह उगे हजारों ऐसे निजी स्कूल हैं, जिनका न तो हैसियत ऑनलाइन क्लास चलवाने की है, और न ही ऐसे विद्यालयों में वैसे बच्चे ही पढ़ते हैं, जिनकी मानसिकता ऑनलाइन क्लास करने की है, और ना ही उनके पास स्मार्टफोन की सुविधा है, यहां तक कि ऐसे बच्चों के अभिभावकों के पास स्मार्टफोन में इंटरनेट के लिए पैसे। ऐसे में सरकार का यह फैसला गांव में रहने वाले अभिभावकों को ध्यान में न रखकर वातानुकूलित कमरे में बैठकर लिया गया फैसला है, जो पूरी तरह से अव्यवहारिक है। शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो जमीन से जुड़े नेता हैं। ऐसे में उन्होंने निजी स्कूल के फैसले के मामले में सभी स्कूलों को एक समान महसूस कर हकीकत से दूर ऐसा फैसला क्यों किया, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है? क्योंकि झारखंड में सिर्फ डीपीएस, डीएवी जैसे ही शिक्षण संस्थान नहीं हैं। यहां ऐसे निजी स्कूल भी हैं जो 5 से10 डिसमिल की परिधि में पांच से सात कमरे में संचालित हो रहे हैं। सरकार ने फीस वसूली के मामले में फैसला लेते वक्त सभी स्कूलों का आकलन, जो एक ही जैसा कर लिया है, वह झारखंड के संदर्भ में कहीं से भी व्यवहारिक नहीं है। सरकार को फैसला लेने से पहले वैसे निजी स्कूलों की माली हालत पर भी ध्यान देने की जरूरत थी तथा उन्हें भी दो माह के बाद फी वसूली में ऑनलाइन क्लास नहीं लेने के बावजूद स्कूल खुलने पर आगे बच्चों की पढ़ाई अतिरिक्त करवाकर व चलाकर ऑनलाइन क्लास नहीं चलाने का, भरपाई का मौका देना चाहिए था। जैसे हड़ताल आदि के दौरान सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों एवं बच्चों के लिए, हड़ताल के समय की भरपाई के लिए अक्सर फैसला सुनाया जाता है। वरना सरकार के इस फैसले से राज्य के सैकड़ों निजी स्कूलों पर ताला लटक सकता है।


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