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पर्यावरण और मानव

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access_time 11-06-2020, 08:57 AM


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सांकेतिक तस्वीर


अनिमेष कुमार चौबे
उच्च शिक्षा, विद्यार्थी

गढ़वा: पर्यावरण संरक्षण की जब हम चर्चा करते हैं तब इसके मूल घटक पृथ्वी, पानी, प्रकाश, पहाड़, पेड़, प्राणी, वायु, अंतरिक्ष की संरक्षण इसमें समाहित होती है, क्योंकि इन मूल घटकों के संरक्षण, संवर्द्धन से ही हम एक स्वस्थ पर्यावरण की कल्पना को मूर्त स्वरूप प्रदान कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति शुरुआत से ही इन मूल तत्व को अमूर्त देवता के रूप में आत्मसात करके पूजते रहा है। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि " दसचूप समावापी, दसवापी समोहदः। दसहदसमः पुत्रः, दसपुत्रः समोदयः।।" अर्थात दस कुआं के सामान एक बावड़ी होता है, दस बावड़ी के समान एक तालाब, दस तालाबों के समान एक पुत्र और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष होता है। मतलब कि वृक्ष को पुत्र से भी ज्यादा महत्व का माना गया है। भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को माँ कहा गया है, नदियों को भी माता कहा गया है और कहा गया है कि जिस प्रकार माता हमें अपने कोख एवं गोद में स्थान देती है, ठीक उसी तरह पृथ्वी हमें स्थान देती है, हमारा पालन करती है। जिस प्रकार माता अपने रक्त से निर्मित दूध पिलाकर हमें पोषित करती है, ठीक उसी तरह नदियां सभ्यता को सिंचित कर के हमें जीवन प्रदान करती हैं। हम लंबे समय तक इसे आत्मसात करके जीवन यापन करते भी रहे। हमने नीम, पीपल, बरगद, आंवला, आम जैसे वृक्षों को पूज्य माना, हमने तुलसी जैसे वनस्पति को पूजा, हमने गाय को पूजा, हमने हाथी को गणेश देवता के रूप में पूजा, हमने बिल्ली, चूहा तक की हत्या को पाप बताकर निषिद्ध किया। अर्थात हमने ईश्वर से अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधि, वनस्पति, विश्व और आकाश सभी को शांति प्रदान करने वाले के रूप में प्रतिस्थापित करने की प्रार्थना किया। भारतीय संस्कृति ने जहां सदैव प्रकृति के दोहन पर बल दिया वहीं इसके शोषण को निषिद्ध भी किया है। तो इस स्थिति में यक्ष प्रश्न यह उठता है कि फिर ऐसा क्या हुआ कि हम एकाएक प्रकृति के मूल घटकों के शत्रु बन बैठे? ऐसा क्या हुआ कि गंगा और यमुना की अमृतधारा आज विषाक्त हो गई? इसके लिए हमें अपने तथाकथित विकास की यात्रा का सूक्ष्म अवलोकन करना पड़ेगा, वह भी शत-प्रतिशत ईमानदारी से। हम इस आधुनिक विकास की यात्रा का जब अध्ययन करेंगे, तो पाएंगे कि इस यात्रा में मानवों की कभी न मिटने वाली आसुरी भूख ने पर्यावरण को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया है, वह भी चारों ओर से। जैसे ज्यादा उपज की भूख ने अंधाधुंध रसायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल को जन्म दिया, जिससे मृदा एवं उपज दोनों प्रदूषित हुए। उत्पादन की भूख ने उद्योगों को जन्म दिया, जिससे वन, जीव, जल, वायु सभी प्रदूषित हुए। मशीनों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने ईंधन की खपत में वृद्धि को जन्म दिया, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन अचानक से बढ़ा और वहीं दूसरी ओर हम इस गैस को अवशोषित कर प्राणवायु आक्सीजन उत्सर्जित करने वाले वृक्षों की अंधाधुंध कटाई करते चले गए, जिससे धरती पर कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हुई और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा उत्पन्न हुआ। जब हमने आधुनिकता के मद में चूर होकर बोरिंग, फिल्टर ,आरओ जैसे विकल्प ढूंढा, तब हम नदियों, तालाबों, झीलों की उपयोगिता को कम करके आंकने लगे और इनमें सीधे प्रदूषण के कारकों को छोड़ने लगे, जिसका परिणाम हुआ कि अमृत धारा प्रवाहित करने वाली गंगा, यमुना आज विषाक्त हो गई। मशीनों एवं कल कारखानों से निकलने वाले धूल, धक्कड़, धुआं ने वायु एवं वर्षा को विषाक्त बना दिया। आज वर्षा जल अम्लीय हो गया है, जिससे जलीय जीव समाप्त हो रहे हैं, नदियां दूषित हो रही हैं, जमीन बंजर हो रहे हैं। इन सब घटनाओं के बीच हमारे मन में एक अभिमान भी जन्म लिया, वह यह है कि, हम इन मूल घटकों का विकल्प खड़ा कर लेंगे, लेकिन समय के साथ यह अहंकार झूठा साबित हुआ और तब तक हम औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और विकास के नाम पर जीवन दायक प्रकृति को एक वीभत्स स्वरूप में लाकर विषाक्त बना बैठे। जिसके परिणाम स्वरूप हमें सूखा, बाढ़, सुनामी, महामारी एवं कैंसर जैसे भयावह चीजों का हमें सामना करना पड़ रहा है। बंधुओं अंत में यही प्रार्थना है कि हमें अपने सभ्यता एवं पीढ़ियों के सुरक्षा के लिए, इन मूल तत्वों की आवश्यकता को समझते हुए, इसके संवर्द्धन एवं संरक्षण के लिए आगे आना होगा और यह सरकारों पर निर्भर रहकर संभव नहीं है, क्योंकि सरकार योजनाओं के नाम पर खानापूर्ति करते फिरते हैं। चाहे वह विश्व की किसी भी देश की सरकार हो। मित्रों परिवर्तन जन की शक्ति से ही संभव हुआ है, अर्थात आइए हम पर्यावरण के मूल घटकों सूर्य, पृथ्वी, आकाश, जल, वनस्पति, औषधि, नदियों, समुद्र की सुरक्षा का प्रण लेकर इसे फिर से पवित्र करें।


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