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कोरोना एवं शिक्षा

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access_time 07-06-2020, 12:06 PM


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सांकेतिक तस्वीर


अनिमेष कुमार चौबे
उच्च शिक्षा विद्यार्थी

गढ़वा: विश्व के 191 देशों को वैश्विक महामारी को रोना ने बुरी तरह से अपने शिकंजे में जकड़ रखा है। इससे अपना भारत भी अब अछूता नहीं रहा बल्कि भारत में भी सामाजिक ,आर्थिक व्यवस्था के साथ-साथ शिक्षा को भी सर्वाधिक प्रभावित किया है। स्कूल से लेकर कॉलेज विश्वविद्यालयों तक सब लगभग ठप हो गए हैं। अकेले भारत में 32 करोड़ शिक्षार्थी इस महामारी के चलते बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं इसमें प्राथमिक माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा के छात्र शामिल हैं जिनमें 16.25 करोड़ लड़के एवं 15.81 करोड़ लड़कियां शामिल हैं। आर्थिक एवं तकनीकी रूप से विकसित संस्थाओं से संबंधित छात्र एक हद तक यूट्यूब, जूम एप, गूगल क्लासेस, फेसबुक, व्हाट्सएप, स्काइप जैसे प्लेटफार्मों एवं सोशल साइट्स के माध्यम से कुछ लाभ ले रहे हैं लेकिन क्या यह पर्याप्त है? चुकी इस महामारी के दौर में यह एकमात्र उपाय है फिर भी क्या भारत जैसे राष्ट्र जहां तीन वक्त के भोजन के लिए आबादी का बड़ा हिस्सा जद्दोजहद कर रहा है, जहां के गांव में आज भी नेटवर्क की पहुंच नहीं हो सकी है, जहां आज भी मोबाइल सर्व सुलभ नहीं बल्कि मोबाइल तक एक हिस्से का ही पहुंच है, वहां इन माध्यमों से क्या शिक्षा की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं? क्या भारत जैसे देश जहां शिक्षा मौलिक अधिकार में शामिल हो वहां बच्चों को इससे दूर रखना जायज है? यदि उपरोक्त उपाय पर्याप्त नहीं है फिर क्या किया जा सकता है? ऐसे समय में समाज को यह स्पष्ट रूप से समझने की आवश्यकता है कि इस परिस्थिति में कानून हमें कोई आश्रय नहीं देने वाला है। एक सामाजिक स्वीकृति के रूप में हमें छात्रों को पढ़ाना है क्योंकि ऐसे विकट समय में प्राथमिक छात्रों के ऊपर मानसिक तनाव तो कम है किंतु उच्च शिक्षा के छात्रों के मन अवसाद से भर सकते हैं। क्योंकि आज के समय में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य रोजगार हो चुका है और रोजगार के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का स्तर आज हम सब को ज्ञात है। आज समाज में समाज के प्रति संवेदित लोगों की जिम्मेदारियां अचानक से बढ़ गए हैं। ऐसे में हमें पक्ष-विपक्ष के राजनैतिक सोच से उपर उठकर, धार्मिक बंदिशों से बाहर निकलकर, जातिगत बंधनों से मुक्त होकर, इन सभी बिंदुओं पर विचार करने की पुरजोर आवश्यकता आन पड़ी है, जो इस संकट से हमें उभारे। आज शिक्षकों को सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति चिंतन करते हुए राष्ट्र एवं समाज के लिए एक नौकरी वाला नहीं बल्कि सामाजिक प्रहरी बनकर अपने पौराणिक स्वरूप को प्राप्त करते हुए वंचितों एवं संचित ओं के बीच की खाई को भरकर समस्त छात्रों का ज्ञान रूपी धारा को प्रवाहित करके सिंचन करना है। आज शिक्षकों को चाणक्य बनकर अपने छात्रों को चंद्रगुप्त की तरह तैयार करना है जिसमें समाज की भी भूमिका निश्चित करनी होगी। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए सामाजिक एकता को प्रदर्शित करने का समय यही है। माता पिता बच्चों का मानसिक रुप से हमेशा उत्साहवर्धन करें छात्रों को बीच कैसे हम शिक्षा को लेकर जाएं इस पर परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग उपाय करें क्योंकि देश के हर हिस्से एवं तबकों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। साथ ही बच्चों को संस्कार एवं संस्कृति की भरपूर जानकारी दें। बच्चों की आदतों का सूक्ष्म अवलोकन कर उसे सदैव उचित मार्गदर्शन दें, जहां तक संभव हो वहां तक समाज के निचले तबके के बच्चों के कल्याण अर्थ शिक्षा का प्रवाह उन तक लेकर जाएं एवं आत्मविश्वास उनमें भरते रहें। विशेष इस संकट के उपरांत हमें अपने बच्चों पर सर्वाधिक मेहनत की आवश्यकता पड़ने वाली है क्योंकि वह भारत के भविष्य हैं इसके लिए अभी से तैयार रहें।


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