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खबर श्री वंशीधर नगर से

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खबर श्री वंशीधर नगर से


दिनेश पांडेय check_circle
संवाददाता



बंशीधर नगर : भारतीय लोक कल्याण संस्थान रांची द्वारा संचालित एग्री क्लिनिक सेंटर के तत्वावधान में मंगलवार को प्रखंड के कुम्बा खुर्द पंचायत में पंचायत के मुखिया विवेक कुमार की अध्यक्षता में पंचायत स्तरीय गोष्ठी का आयोजन किया गया.गोष्ठी में एग्री क्लिनिक सेंटर के प्रखंड समन्वयक सरोज सोनकर ने किसानों को बीज विनयम,ब्लॉक चेन पंजीकरण, झारखंड राज्य फसल राहत योजना,गव्य व मत्स्य योजना,टपक सिंचाई योजना की जानकारी विस्तार से दिया गया.उन्होंने किसानों को जानकारी देते हुये बताया कि कृषि विभाग के द्वारा यदि कोई योजना लेना चाहते हैं तो ब्लॉक चेन पंजीकरण अवश्य करावें.उन्होंने कहा कि किसानों को झारखंड राज्य फसल राहत योजना में 30-50 प्रतिशत प्रति एकड़ फसल क्षति होने पर 3000 रुपये,50 प्रतिशत से अधिक फसल की क्षति होने पर 4000 रुपये की राशि दिया जायेगा. उन्होंने कहा कि किसान 10 डिसमिल से लेकर 5 एकड़ के लिये निबंधन करा सकते है. गोष्ठी में क्षेत्र समन्वयक बालदेव खलखो,किसान मित्र दिलीप पटेल,किसान हृदय प्रसाद यादव,कामेश्वर चंद्रवंशी, ललन राम,अमरनाथ चौधरी,भगवन्ती देवी,फुलवा देवी,मीना देवी,सुकवरिया देवी,सूरज कुमार पटेल,पूनम देवी सहित अन्य उपस्थित थे. जैसे मछली जल के बिना व्याकुल हो जाती है, ऐसे ही हम यदि भगवान्‌ के बिना व्याकुल हो जायँ तो भगवान्‌ के मिलने में देर नहीं लगेगी:- श्री जीयर स्वामी जी महाराज सत् के बिना असत्‌ को देख नहीं सकते और असत् के बिना वर्णन नहीं कर सकते।
परमात्मतत्त्व का वर्णन नहीं होता, प्रत्युत अनुभव होता है।परमात्मतत्त्व के सिवाय अन्य की जितनी भी स्वीकृति है, उतना ही अज्ञान है।जगन्नाथ भगवान् के रहते हुए अपने को अनाथ मानना भूल है।मनुष्य को ईश्वर में केवल विश्वास ही करना चाहिये । अगर वह संसार में विश्वास और ईश्वर में विवेक लगायेगा तो नास्तिक हो जायगा।साधक को पहले भगवान् दूर दीखते हैं, फिर नजदीक दीखते फिर अपने में दीखते हैं, फिर केवल भगवान् ही दीखते हैं।परमात्मा में जीव है और जीव में जगत् है। अतः परमात्मा की तो स्वतन्त्र सत्ता है, पर जीव और जगत्की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।सम्पूर्ण देश, काल, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदिका अभाव होनेपर भी जो शेष रहता है, वही परमात्मतत्त्व है।
जैसे गाय का दूध गाय के लिये नहीं है, प्रत्युत दूसरों के लिये ही है, ऐसे ही भगवान् की कृपा भगवान्‌ के लिये नहीं है, प्रत्युत दूसरों (हम सभी) के लिये ही है।अगर भगवान् की दया चाहते हो तो अपने से छोटों पर दया करो, तब भगवान् दया करेंगे। दया चाहते हो, पर करते नहीं – यह अन्याय है, अपने ज्ञानका तिरस्कार है।जो गीता अर्जुन को भी दुबारा सुनने को नहीं मिली, वह हमें प्रतिदिन पढ़ने-सुननेको मिल रही है - यह भगवान्‌ की कितनी विलक्षण कृपा है।आज तक जितने भी महात्मा हुए हैं, वे भगवत्कृपा से ही जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ तथा भगवत्प्रेमी हुए हैं, अपने उद्योगसे नहीं।स्वत:सिद्ध परमपद की प्राप्ति अपने कर्मों से, अपने पुरुषार्थ से अथवा अपने साधनसे नहीं होती ।
यह तो केवल भगवत्कृपा से ही होती है।भगवत्प्राप्त साधक संसार से कभी आशा न रखे; क्योंकि वह सदा नहीं रहता और परमात्मा से कभी निराश न हो; क्योंकि उनका कभी अभाव नहीं होता।सच्चे हृदय से भगवान्‌ को चाहनेवाला मनुष्य किसी भी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, परिस्थिति आदि में क्यों न हो और कितना ही पापी, दुराचारी क्यों न हो, वह भगवत्प्राप्तिका पूर्ण अधिकारी है।भगवान्‌ के विषय में सन्तोष करना और संसार के विषय में असन्तोष करना महान् हानिकारक है।भगवान् की प्राप्ति होने पर फिर कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता। इसी में मनुष्यजीवन की पूर्णता, सफलता है।साधक को विचार करना चाहिये कि भगवान् सब देशमें हैं, इसलिये यहाँ भी हैं; सब काल में हैं, इसलिये अब भी हैं; सब में हैं, इसलिये अपनेमें भी हैं; सबके हैं, इसलिये मेरे भी हैं।
भगवत्प्राप्ति में व्याकुलता से जितना जल्दी लाभ होता है, उतना जल्दी लाभ विचारपूर्वक किये गये साधन से नहीं होता।स्वयं में तीव्र उत्कण्ठा न होने के कारण ही भगवत्प्राप्ति में देर हो रही है।खेल में छिपे हुए बालक को दूसरा बालक देख ले तो वह सामने आ जाता है कि अब तो इसने मुझे देख लिया, अब क्या छिपना! ऐसे ही भगवान् सब जगह छिपे हुए हैं। अगर साधक सब जगह भगवान्‌को देखे तो फिर भगवान् उससे छिपे नहीं रहेंगे, सामने आ जायँगे।सब ओर से विमुख होने पर साधक अपने में ही अपने प्रियतम भगवान्‌ को पा लेता है।




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