3 दिसंबर 1984 की वो काली रात जो हिंदुस्तान के इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी... यह वह रात थी जिसका दर्द भोपाल आज भी नहीं भूल पाया और शायद कभी भूला भी नहीं पाएगा। उस काली रात को हिंदुस्तान के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा जिसका असर आज भी ज़िंदा है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में लाखों लोग रोज़ाना की तरह रात में सोने चले गए इस उम्मीद के साथ कि कल की सुबह भी हमेशा की तरह आएगी मगर क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था. अगली सुबह होने से पहले ही आधी रात को भोपाल में एक वाकिया हुआ जो इतिहास में दर्ज हो गया। फ़ैक्टरी से निकले यूनियन कार्बाइड नाम की एक फैक्ट्री से निकली जहरीली गैस ने हज़ारों लोगों की ज़िंदगी ख़त्म कर दी। यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी में लीक हुयी मिथाइल आइसोसाइनेट गैस ने रात के अँधेरे में किसी को भी सोचने का वक़्त नहीं दिया, देखते-देखते हज़ारों लोगों की जानें चली गयी। हजारों परिवारों तबाह हो गए। पूरा शहर नींद की आगोश में था तभी भोपाल के बड़े इलाके में लाशों के ढेर बिछ गए। इतनी लाशें हो गई कि ढोने के लिए गाड़ियां छोटी पड़ गईं। अस्पताल में कफन कम पड़ गए थे। चंद लोगों की लापरवाही, कभी खत्म न होने वाला न जाने कैसा दर्द दे गई... आज त्रासदी की 36वीं बरसी पर वो तस्वीरें देखकर आप विचलित हो सकते हैं।
इस हादसे की जांच के बाद सामने आया कि यहां के अधिकतर उपकरण ठीक नहीं थे। काफी कुछ उपकरण जर्जर हो चुके थे जिन्हें सही नहीं करवाया गया था। वहीं कारखाने के सिक्योरिटी मैन्युअल इंग्लिश में थे, जबकि वहां पर अधिकतर काम करने वाले छोटे तबके के लोग थे जिन्हें इंग्लिश नहीं आती थी। उनको उपकरणों के रखरखाव या दूसरी सुरक्षा के बारे में भी कोई जानकारी नहीं थी। 2-3 दिसंबर की रात कंपनी ने एक टैंक में जरूरत से ज्यादा गैस मौजूदा थी। यहां का तापमान भी सामान्य से अधिक था। यहां पर मौजूद हर टैंक की कैपेसिटी 68 हजार लीटर लिक्विड एमआईसी की थी। लेकिन इनको केवल 50 फीसद तक ही भरा जाता था। लेकिन उस रात एक टैंक में इस मानक को नजरअंदाज किया गया था। हादसे वाली रात कुछ कर्मचारी अंडरग्राउंड टैंक के पास पाइपलाइन की सफाई कर रहे थे। बताया जाता है कि टैंक नंबर 610 में जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस, पानी से मिल गई थी। इससे हुई रासायनिक प्रक्रिया की वजह से टैंक में दबाव पैदा हो गया, उस दौरान यहां का तापमान 200 डिग्री तक पहुंच गया था, जबकि इसको महज 5 डिग्री होना चाहिए था। इसकी वजह से एक फ्रीजर प्लांट का बंद करना पड़ा। यहां की बिजली कट चुकी थी। तापमान बढ़ने की वजह से गैस दूसरे पाइप के जरिए लीक होने लगी। कुछ कसर खराब वॉल्व ने पूरी कर दी थी। रिसाव के कुछ देर बाद सिक्योरिटी अलार्म बज गया। जहरीली गैस भोपाल के आसमान में फैलने लगी थी। रिसाव शुरू होने के कुछ घंटे बाद ही इसकी गिरफ्त में भोपाल का बड़ा हिस्सा आ चुका था। धीरे-धीरे लोगों को आंखों में जलन और सांस लेने में दिक्कत हो गई थी। किसी को ये नहीं समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ये सब कुछ क्यों हो रहा है। रातों-रात लोगों को उलटी शुरू हो गई और सड़कों पर पड़ी लाशों की गिनती बढ़ने लगी थी। सुबह तक हालात खराब हो चुके थे। प्रशासन ने आननफानन में यहां के लोगों को इलाका खाली करने का निर्देश दे दिया था, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। जो लोग रोजी-रोटी की तलाश में दूर-दूर के गांवों से आकर वहां झुग्गी झोपडी में रह रहे थे। इस रिसाव के कारण महज तीन मिनट में हजारों लोग न केवल मौत की नींद सो गए बल्कि लाखों लोग हमेशा-हमेशा के लिए दिव्यांग हो गए। मध्य प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने इस हादसे में 3787 लोगों के मारे जाने की पुष्टि की थी, मगर सच का आंकड़ा इससे कहीं उलट था, कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हादसे में सरकारी आंकड़े से कई गुना ज्यादा यानि लगभग 23 हज़ार लोगों की मौत हुयी थी। और इस हादसे की चपेट में तकरीबन पांच लाख लोग आए थे। जिस गैस की वजह से भोपाल के लोगों की हालत खराब हुई थी उसका नाम मिथाइल आइसो साइनाइट गैस है, इसका उपयोग कीटनाशक के तौर पर किया जाता है। बताया जाता है कि यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से उस रात करीब 40 टन गैस का रिसाव हुआ था। और ये त्रासदी पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना है। उस वक्त हादसे की गंभीरता को भांपते हुए फ़ैक्ट्री का संचालक वॉरेन एंडरसन देश छोड़कर भाग गया था। इसके बाद कई सरकारों ने उसको वापस लाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहीं।
यह पहला ऐसा हादसा था जब हांफते और आंखों में जलन लिए जब प्रभावित लोग अस्पताल पहुंचे तो ऐसी स्थिति में उनका क्या इलाज किया जाना चाहिए, ये डॉक्टरों को मालूम ही नहीं था। शहर के दो अस्पतालों में इलाज के लिए आए लोगों के लिए जगह नहीं थी। वहां आए लोगों में कुछ अस्थाई अंधेपन का शिकार थे, कुछ का सिर चकरा रहा था और सांस की तकलीफ तो सब को थी। एक अनुमान के अनुसार पहले दो दिनों में करीब 50 हजार लोगों का इलाज किया गया। शुरू में डॉक्टरों को ठीक से पता नहीं था कि क्या किया जाए क्योंकि उन्हें मिथाइल आइसोसाइनेट गैस से पीड़ित लोगों के इलाज का कोई अनुभव जो नहीं था। हालांकि गैस रिसाव के आठ घंटे बाद भोपाल को जहरीली गैसों के असर से मुक्त मान लिया गया था। लेकिन 1984 में हुए इस हादसे से अब भी यह शहर उबर नहीं पाया है। कुछ रिपोर्ट्स में ये भी पता चला है कि गैस रिसाव के बाद कंटामिनेशन धीरे-धीरे और खराब होता जा रहा है। अटल अयूब नगर के हैंड पंप का पानी तो 1999 तक पानी जहरीला था। रिसर्च बताती हैं कि सात गुना और जहरीला हो गया था। गैस का साइड इफेक्ट इतना अधिक था कि आज भी जन्म लेने वाले बच्चों को कैंसर होता है।
भोपाल गैस कांड को 36 वर्ष गुजर चुके हैं इसके बाद भी आज तक यूनियन कार्बाइड कारखाने में पड़े 340 टन जहरीले कचरे को नष्ट नहीं किया जा सका है। इसकी वजह से आसपास का पानी दूषित हो रहा है। कोर्ट इस पर नाराजगी जता चुका है। इस रासायनिक कचरे की वजह से यहां की करीब 50 कालोनियों में पानी का प्रदूषण स्तर सामान्य से कहीं अधिक है।
36 वर्षों के बाद भी इस हादसे के पीड़ितों को पूरा न्याय नहीं मिल सका है। आज भी कोर्ट के अंदर इसके मुआवजे का मामला लंबित है। इस बीच इस हादसे के मुख्य आरोपी और फैक्ट्री के संचालक वॉरेन एंडरसन की 29 सितंबर 2014 को उसकी मौत हो गई। इसके अलावा भोपाल गैस त्रासदी को लेकर आवाज उठाने वाले और पीड़ितों को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ने वाले अब्दुल जब्बार का भी 14 नवंबर 2019 को निधन हो गया। उन्हें भारत सरकार ने पद्म श्री से सम्मानित किया था। वे भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के संयोजक थे। भोपाल गैस हादसा दुनिया के कुछ बड़े औधोगिक हादसों में शामिल किया जाता है। इस गैस हादसे न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ने वाले अब्दुल जब्बार ने भी अपने माता-पिता और भाई को भी खोया था।